झरने पर पहाड़ की परछाई | कल्लोल मुख़र्जी

झरने का विलाप कम होता गया और मैं आहिस्ता आहिस्ता पहाड़ चढ़ता गया। अँधेरा घना था, चाँद काला और आसमान सफ़ेद। मैं कुछ और ऊपर पहुँचता कि तभी उस सफ़ेद आसमान में लाल बादल उमड़े और सूखे भावों की वर्षा से झरने के विलाप की आवाज़ तेज़ हो गई, इतनी कि कानों के पर्दों को चीर, सीमेंट-ईंट जमाकर घर कर गई।

शायद मैं बहरा हूँ, जो मुझे उस घर में मेरे इंतज़ार में हो रहा विलाप नहीं सुनाई देता। शायद मैं अंधा हूँ, जो मुझे उसकी आँखों में उमड़े लाल बादलों से होती वर्षा दिखाई नहीं देती। क्या मैं गूंगा हूँ? सब जानते हुए भी चुप हूँ?

वर्षा रुक गई है और झरने का कोलाहल भी शमशान हो चुका है। मैं शिखर में हूँ, मृत। घायल साँसें चल रही हैं, दिल से खून बह रहा है। आँखें खोलकर देखता हूँ तो झरना नहीं दिखता; लोभ के काले बादलों ने दृष्टि रोक दी है। कानों से झरने की आवाज़ नहीं आती। वो उजड़ा घर, संदूक, बिस्तर, वो, मैं, सब अदृश्य है। मैंने अपना चाँद जीत लिया है मगर वो चाँद जिसका सूरज मेरे घर की खिड़की से उगता था, गायब है, मृत है, अनजान है।

मैं खो चुका हूँ उसको, खुदको; पा चुका हूँ, ज़िन्दगी और मौत के लोभ को, भौतिकता को।

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