गौ हत्या | कल्लोल मुख़र्जी

आज जब मैं इस बड़े से दरवाज़े के सामने खड़ा इसके खुलने के इंतज़ार में यह अंदाज़ा लगा रहा हूँ कि यह जन्नत का दरवाज़ा है या जहन्नुम का, तो नीचे की दुनिया में बितायी मेरी छोटी सी ज़िन्दगी के पन्ने मेरी आँखों के सामने घूम जाते हैं। जब ज़िंदा था तो कभी वक़्त ही नहीं मिला सोचने का कि मैं जो कर रहा हूँ सही कर रहा हूँ या गलत। मैंने कहीं किसी के साथ धोखा तो नहीं किया, किसी का दिल तो नहीं दुखाया, कभी बईमानी तो नहीं की।

मुझे जहाँ तक याद है, मैंने शायद ही ऐसा कुछ काम किया था जिसके कारण मुझे जहन्नुम में जाना पड़े। राधेपुर गाँव का एक छोटा सा किसान और ग्वाला ही तो था मैं। दो गायें, एक छोटा सा खेत, एक जोरू और एक बेटा, जो सरकारी यूनिवर्सिटी से हिंदी में पी.एच.डी कर रहा था। उस बेचारे को भी अपने कॉलेज में गरीबी के ताने सहने पड़ते थे। सीनियर तो अपने सारे काम उससे ही कराते। इतने रसूखदार लोग थे वो लोग कि शिकायत के बाद भी उसे ही मुँह बंद रखने की धमकी दी जाती।

गरीब थे हम तो ख़्वाहिशों को कभी तवज्जो नहीं दी, अपनी ज़रूरतें पूरा कर ही खुश हो जाते थे। रोज़ घर में तीन-तीन, नौ रोटियां और एक सब्ज़ी बन जाये उसी में खुश हो जाया करते थे। कितना अजीब है ना? जिस फसल को हम खून पसीने से सींचकर बड़ा करते हैं, वही फसल हमें नसीब नहीं होती। सरकारें तो कब का साथ छोड़ चुकी थीं, अब तो शायद ऊपरवाले ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं।

ऐसा क्यूँ होता है हमेशा कि अमीर और ज्यादा अमीर हो जाते हैं और गरीब और भी ज्यादा गरीब?

उन दिनों गर्मी अपने पूरे ज़ोर पर थी। तापमान इतना ज़्यादा हो गया था कि मैं खेत में जो पानी पीने वाला लोटा ले जाता था वो बिना पिए ही आधा हो जाता था। मैं भले ही भूखा रह लूँ मगर खेत की सिंचाई और सीता-सलीमा के खान पान में कोई कमी नहीं होने देता था। सीता सलीमा को नहीं जानते? दरअसल, ये दोनों मेरी गायें हैं। रामदयाल और मेरी दोस्ती के चर्चे पूरे गाँव में मशहूर थे, कुछ लोग तो हमारी दोस्ती से जलते भी थे। मेरी और उसकी लुगाई, दोनों एक ही समय पेट से थीं। हम दोनों को बेटियाँ चाहिए थी, इसलिए हमने नाम भी सोच लिए थे। उसने मेरी बेटी का नाम सलीमा सुझाया और मैंने सीता। पर हम दोनों को ही बेटे हुए तो मैंने अपनी गायों का नाम सीता और सलीमा रख दिया।

सीता और सलीमा को मैं जान से ज्यादा चाहता था और फिर ये मेरी कमाई का जरिया भी तो थीं। रोज़ सुबह सुबह खेत जाता, खेती करता, फ़िर घर घर दूध बेचने जाता, अपना खून पसीना बहाता ताकि मेरी जोरू और बेटे को एक अच्छा जीवन दे सकूँ, बेटे के कॉलेज की फीस भर सकूँ, दो वक़्त की रोटी जुटा सकूँ बस इतनी ही चाहत थी मेरी। बस लड़के की पढ़ाई ठीक से हो जाए तो मैं और मेरी जोरू दोनों का जीवन सुधर जाएगा, यही सोच मैं पूरा ज़ोर लगाता।

कल जब खेत से थक हारकर वापस घर आया तो देखा कि सलीमा लेटी पड़ी है। मैंने उसे काफ़ी उठाने की कोशिश की। पानी, चारा मुँह तक लाकर दिया मगर वो नहीं उठी। मैं भागते भागते डॉक्टर साहब के पास गया और उन्हें बुला कर लाया मगर अब शायद बहुत देर हो चुकी थी।

अत्याधिक धूप और गर्मी के कारण सलीमा की मौत हो चुकी थी।

जोरू को जब यह बात पता चली तो वो भी रो रो कर बेहाल हो गयी। मैं उसे संभालने की कोशिश कर रहा था पर खुद इस असहनीय दर्द को बर्दाश्त नहीं पा रहा था। सलीमा सिर्फ़ हमारी रोज़ी रोटी का साधन ही नहीं थी, बल्कि हमारे परिवार का एक सदस्य थी।

बेटा जब घर आया तो काफ़ी परेशान लग रहा था इसलिए हमने उसे सलीमा की मौत की खबर बताना मुनासिब नहीं समझा। हम उसके चेहरे पर मुस्कान तो ला नहीं पाते हैं, इसलिए उसके चेहरे की शिकन को और बढ़ाना नहीं चाहते थे।

दिन भर का थका था तो पता ही नहीं चला कब सो गए हम लोग। सोये हुए कुछ ही समय हुआ था कि मुझे अचानक बहुत ही ज्यादा गर्मी का एहसास हुआ। नींद खुली तो देखा मेरे घर में आग लगी हुई है और गाँव के कुछ लोग मुझे, मेरी जोरू और बेटे को लट्ठ से मार रहे थे और चिल्ला रहे थे “जय श्री राम”।

मैंने अपनी आवाज़ गाँव वालों तक पहुंचाने की बहुत कोशिशें की पर सब नाकाम। कोई सुनना ही नहीं चाहता मेरी बात। गौ-हत्या का ऐसा इलज़ाम लगा था मुझपर कि मेरा जिगरी दोस्त भी उसी भीड़ में शामिल था, जो मुझे मेरे परिवार सहित ज़िंदा जला रही थी। जिस औरत को वो कभी भौजी भौजी कहते नहीं थकता था, आज उसी के लिए गालियों की बरसात करने को कैसे उसका मन गवाही दे रहा था? जिस बेटे को उसने हाथ में खिलाया था, कैसे वो उसे जला पा रहा था?

गाँववालों के रवैये से तकलीफ नहीं थी मुझे पर रामदयाल के इस अवतार ने मुझे जीते जी मार दिया था। शायद मज़हब के नाम पर हम सब अंधे, बहरे और गूंगे हो जाते हैं।

आज एक जानवर जिसकी मौत में मेरा कोई हाथ नहीं था, उसके कारण मेरा पूरा परिवार तबाह हो रहा था। और मज़े की बात तो यह है कि वो लोग मुझे कसाई कह रहे थे।

ज़िन्दगी का क्या भरोसा है, आज है कल नहीं। मुझे अपनी मौत का ग़म नहीं है, अगर कोई मेरा क़त्ल किसी और कारण से करता तो शायद मैं उन्हें माफ़ भी कर देता, पर मुझे तो मज़हब के नाम पर, बेईज्ज़त कर के मारा गया।

मेरी मौत का ज़िम्मेदार कोई इंसान नहीं है, बल्कि वो हैवान हैं जो इंसान का जामा ओढ़े हैं, जिन्हें मैं कभी माफ़ नहीं कर सकता।

आज मौत सिर्फ़ मेरी नहीं बल्कि इंसानियत की हुई है। ना जाने कितने और लोग मारे जाएंगे अभी। जिस गाय के रख रखाव पर लोग कभी मेरी तारीफों के कसीदे पढ़ा करते थे, आज उसी की कुदरती मौत के लिए मुझे ज़िंदा जला दिया गया।

खैर, अब इन बातों के बारे में सोचने से कोई फायदा नहीं। दरवाज़ा खुल गया है, और अब शायद मुझे फ़र्क नहीं पड़ता कि ये जन्नत का दरवाज़ा है या जहन्नुम का।

जो भी होगा, उस जहन्नुम से तो बेहतर ही होगा, जहाँ से मैं अभी आया हूँ।

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One comment

  1. वाह भाई
    समसामयिक रचना है
    आप जैसे समय सजग भाइयों का मेरे ब्लाॅग पर सदैव स्वागत है 😊😊

    Like

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