आत्मगमन । कल्लोल मुख़र्जी

वो रोज़ मरता है और रोज़ पैदा होता है। नींद एक मौत ही है जहाँ वो खोकर एक दुनिया बुनता है और पहले से बुनी हुई दुनिया को जीता है। जिस दुनिया में वो सांस लेता है, उस दुनिया की कमियों को आपने इस दुनिया का हिस्सा बनाता है। रोज़ मरता है, दुनिया बुनता है और नए चरित्रों के साथ एक महाकहानी को जन्म देता है।

शायद उसकी वास्तविक दुनिया भी एक सपना है, जिसे उसने लंबी मौत के पहले देखा, सजाया, और बुन पाया था। अब उस दुनिया की त्रुटि को इस दुनिया में सुधार कर रहा है। वास्तविक दुनिया के किरदार भी वो खुद चुनता है, दोस्त खुद बनाता है, पूरी कहानी के एक एक दृश्य को जीता है। कुछ बुरा हो जाए तो तकदीर को दोषी और अच्छा हो जाए तो तकदीर का शुक्रिया करता है।

यह तकदीर आखिर क्या है?

तकदीर उसके जीवन की महाकहानी है जो उसने अपने पिछले लंबे सपने के पहले तक बुनी थी। वास्तविक दुनिया के सारे किरदार उसके ही बनाए हुए है और सपनों वाली दुनिया में इन्ही किरदारों को वो सुधारता है ताकि भविष्य की दुनिया थोड़ी सहज हो सके।

उसकी सपनों वाली दुनिया अब हकीकत है। कल रात सपने में सपनों वाली दुनिया को बुनते वक़्त उसकी सांसें रुक गई। अब वो फिर जन्म लेगा और सपनों वाली दुनिया को हकीकत में भोगेगा और फिर नई दुनिया बुनेगा जबतक उसकी दुनिया दोषहीन ना बन जाए।

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