“मैं ही इस लड़के का बाप हूँ।”

दरवाज़े पर एक ताला लगा हुआ है। ताला बहुत पुराना है शायद ज़ंग भी लग चुका है। उस ताले की चाबी मेरे हाँथ में है। कमरा खाली है मगर जज़बातों से भरा हुआ है, लबालब। मानो यह जज़्बात, अल्फ़ाज़ बनकर दरवाज़ा तोड़ अभी बाहर आ जायेंगे। हाँथ और कमरे के बीच एक अदृश्य मोटी दीवार है। यह ताला जिस कमरे में लगा हुआ है वो मेरा “दिल” है।

“अंकल, क्या आप मुझे मेरे पापा से मिलाओगे? मुझे मेरे पापा के पास जाना है।”

यह लड़का किसका है मुझे पता है मगर मैं बता नहीं सकता। इसकी रगों में किसका खून दौड़ रहा है यह मुझे पता है मगर एक ज़ंज़ीर है जो मुझे रोके, जकड़े हुए है। मेरे अंदर भावों का एक अम्बार टूटने लगा है मगर बाहर सब शांत है। मेरी ज़बान सूखी हुई है मगर आत्मा आँसुओं की बाढ़ में तबाह हो चुकी है।

ज़िन्दगी की पहेलियों में उलझ सा गया हूँ। इन मासूम सवालों में कहीं फँस सा गया हूँ। जकड़ा सा हूँ मैं, कैसे कहूँ?

“मैं ही इस लड़के का बाप हूँ।”

————————————

बाएं, ओपूर संसार, सत्यजीत रॉय, मेरी मनपसंद फिल्म। दाएं, मासूम, शेखर कपूर। शेखर कपूर अपनी फिल्म मासूम के ज़रिये उन अनुभवों के बहुत करीब पहुँच गए है जो मैंने ओपूर संसार के आखरी दृश्य को देखते वक़्त महसूस किया।

नोट – यह कोई तुलना नहीं है। कृपा इसे तराज़ू में ना तौलें। दोनों फिल्मों का विषय, कहानी कहने का तरीका और कहानी अलग है। यहाँ सिर्फ एक अनुभव की बात की जा रही है। दोनों ही फिल्में भारतीय सिनेमा का गौरव है।

Advertisements

2 comments

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s