मनोज ने क्यों नहीं की आत्महत्या । कल्लोल मुख़र्जी

आजकल आत्महत्या की ख़बरों को मेरे कान ज़्यादा पसंद कर रहे है शायद इसलिए पिछले तीन दिनों से आत्महत्या की ख़बरें ही सुन रहा हूँ। पहले बम्बई में छात्र की आत्महत्या, फिर बनारस आईआईटी में आत्महत्या और अब मोहल्ले में आत्महत्या।

मगर क्या आत्महत्या वक़्त की चुनौतियों से भागने का सही रास्ता है? शायद है। मगर चुनौतियों से भागना क्या सही निर्णय है? बिलकुल नहीं। चलिए एक छोटी सी कहानी सुनाता हूँ।

इस देश में मेथड ऐक्टिंग में लोहा मनवा चुके अभिनेता मनोज बाजपेई को बचपन से ही अभिनय का कीड़ा था और शायद इसलिए गाँव में होने वाले रामायण से लेकर स्कूल कॉलेज के कार्यक्रमों में बढ़कर भाग लेते थे। ॐ पुरी, नसीरुद्दीन शाह जैसे अभिनेताओं की अभिनय शक्ति के क़ायल बाजपई ने जब उनके जड़ की खोज की तो पाया वे दोनो ही अभिनेता एन॰एस॰डी॰ से पास आउट है।

फिर क्या था? बाजपेई लग गए एन॰एस॰डी॰ में दाख़िल पाने की होड़ में। एक-एक कर तीन साल लगातार दाख़िले की कोशिश की मगर एन॰एस॰डी॰ की धूल तक हाथ नहीं लगी। मनोज हार मान चुके थे और आत्महत्या के विचारों को बढ़ावा देने लगे थे।

उनके इन विचोरों की भनक अभिनेता रघुवीर यादव तक पहुँची तो उन्होंने मनोज को बेरी जॉन के वर्कशॉप जाने की सलाह दी। कीड़ा तो था, अब भले ही थक चुका हो मगर ज़िंदा था। मनोज, जॉन के साथ जुड़ गए और जॉन को इतना लुभा गए गए कि जॉन ने मनोज को अपना ऐक्टिंग असिस्टेंट रख लिया।

चौथी बार मनोज ने एन॰एस॰डी॰ की परीक्षा दी। इस बार वहाँ मौजूद परीक्षकों को इस तरह अपने अभिनय का क़ायल बना गए कि उन्हें छात्र की जगह शिक्षक नियुक्त कर दिया गया।

अगर अपने संघर्ष के दिनों में ही मनोज अपनी समस्याओं से भाग जाते तो क्या आज वे इतने बड़े अभिनेता बन पाते? क्या एन॰एस॰डी॰ उन्हें छात्र के बजाए शिक्षक नियुक्त करता? क्या वे अपने अभिनय से इस देश का नाम रौशन कर पाते? नहीं।

जब ज़ोरों की आँधी दीये की लौ को बुझाने की कोशिश करती है तो वो फड़फड़ाती है, उन आँधियों से बचने की कोशिश करती है मगर बुझती नहीं है। उसे पता होता है कि वो बुझ जाए तो आस पास सब अंधकार हो जाएगा। उसे यह भी पता होता है कि आँधी कुछ वक़्त के लिए है, आएगी फिर चले जाएगी मगर उसे तो अभी जलना है और आस पास फैले अंधकार को दूर भगाना है।

हमारी समस्याएँ भी हवा के झोकों की तरह होती है, आती जाती रहती है मगर हमें अपने जीवन की लौ को बुझने नहीं देना चाहिए क्यूँकि हम इस लौ के सहारे सिर्फ़ ख़ुद को नहीं बल्कि आस पास मौजूद लोगों को भी रौशनी पहुँचते है।

अंधकार को अपनाकर उसमें घुम हो जाने से आप सही पते में नहीं पहुँचते बल्कि अंधकार में रौशनी जलाकर ही सही पते पहुँचा जा सकता है, कोशिश तो की ही जा सकती है।

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