“कश्मीर माँगे आज़ादी, हम छीन के लेंगे आज़ादी” ‍। कल्लोल मुख़र्जी

कश्मीर ख़ूबसूरती की चादर ओढ़े बारूद की ज़मीन है। जब भी कश्मीर की बात आती है देश की पढ़े लिखे अनपढ़ जनता के दिमाग़ में जमा भूसा जलने लागता है। कश्मीर यानी देशद्रोहों का इलाक़ा और कश्मीर का हर निवसी देशद्रोह।

“कश्मीर को देश के बाक़ी राज्यों समान अधिकार प्राप्त हो।” कहते कहते अम्बेडकर के जीभ में छाला पड़ गया मगर नेहरु और गांधी को तो जैसे राजनीति सूँघ गई थी।

संविधान बना और कश्मीर को स्पेशल राज्य का दर्जा मिल गया। कश्मीर का जितना हिस्सा राजा हरिसिंह हार गए वो पी॰ओ॰के॰ यानी पाकिस्तान ऑक्युपायड कश्मीर बन गया।

राजनीति शुरू हुई और दोनो ही देशों के नेताओं ने इस राज्य का जमकर फ़ायदा उठाया। उधर पाकिस्तान अनपढ़ लड़कों को आतंकवादी बनाकर कश्मीर भेजता और पत्थरबाज़ी कर अपने लोगों में वाह लूटता और इधर कड़े शब्दों में निंदा से आगे नेता बढ़ नहीं पाते।

हालत गम्भीर होते गए। कश्मीर, शिक्षा, बेरोज़गारी, आतंकवाद आदि जैसे ख़तरनाक रोग से तड़पता रहा मगर दिल्ली में नेता उस रोग की बस कड़े शब्दों में निंदा करते रहे और आज भी कर रहे है।

हालत इतने बिगड़ गए कि AFSPA लग गया। इसके लगने से निंदा वाले शब्दों को रूप मिला और नेता जी को वोट। आर्मी को अधिकार प्राप्त हो गया कि वे किसी को भी बिना वर्रेंट के गिरफ़्तार कर सकते है, किसी को भी मार सकते है, इत्यादि। क़ानून कुछ ऐसा था कि थोड़ा भी इधर उधर हुआ तो कश्मीर के वासियों का मानवाधिकार ऐसे फिसल जाएगा जैसे मुट्ठी से रेत फिसलती है।

वैसे हमारा देश और पड़ोसी मुल्क एक चीज़ में बड़ा माहिर है, धर्म को उसके अंतिम छोर पर ले जाना और फिर धर्म के नाम पर नंगा नाच करना। क्या करे? देश में बेरोज़गारी ही इतनी है कि कुछ बोलो तो तलवारें निकाल लेंगे। इस ख़ासियत की छाप कश्मीर में पड़ना लाज़मी था, आख़िर स्पेशल स्टेट जो ठहरा। कभी कश्मीरी पंडितों के नाम पर ख़ून बहता तो कभी कश्मीरी मुल्लों के नाम से।

कश्मीर को पीछे धकेलने और आतंक का एक केंद्र बनने के पीछे अगर आज कोई दोषी है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ इस और उस देश के नेता, जिन्हें सिर्फ़ अपनी राजनैतिक रोटियों से मतलब है।

पहले कांग्रेस थी, थोड़ी लिब्रल थी तो कुछ ना ना कर कश्मीर के निवासियों को थोड़ा आराम था मगर जैसे ही भाजपा आयी यह आराम हराम में बदल गया।

बताइए आख़िर क्या कारण होगा जो पहले 7% वोट पड़े अब फिर 2%. मोटा मोटा पार्टियों के लोगों ने ही वोट डाला बाक़ी कश्मीर ने नहीं। इसका कारण पहला तो आज़ादी के सत्तर साल बाद भी कश्मीर का स्पेशल स्टेट बने रह जाना और दूसरा कट्टरवादों का सत्ता में आना।

गाय ज़्यादा ज़रूरी है इंसान से। धर्म ज़्यादा ज़रूरी है ख़ून से। यह अंधी अनपढ़ सरकार ना सिर्फ़ देश को हिंदू तालिबान की शक्ल देने में आमादा है बल्कि कश्मीर के मसले को राजनैतिक तरीक़े से सुलझाने के बग़ैर बारूद का इस्तेमाल करना चाहती है। पिछले एक महीने में कश्मीर के एक दर्जन से ज़्यादा आवम मारे गए। क्यूँ? कुछ नहीं पता बस मारे गए। स्कूल से ग़ायब हो गए। घरों में बलात्कार हो गया।

इंतक़ाम से इंतक़ाम का जन्म होता है। लोगों को भड़काकर, अपना भक्त बनाकर, कट्टरवाद को बढ़ावा देकर नहीं।

कश्मीर की आवाम डरी हुई है। वहाँ मौजूद आर्मी की जान ख़तरे में है और महोदय सेल्फ़ीयाँ लेने में व्यस्त है।

सच है, इन सत्तर सालों में कुछ बदला है तो राजनेताओं की शक्ल और कुछ अविचल है तो कशमिरियों और वहाँ मौजूद आर्मी की सूरत, जो आज भी गंदी राजनीति में पिस कर मर रहे है और आगे भी मरते रहेंगे।

कश्मीर माँगे आज़ादी।
आज़ादी, स्पेशल स्टेट से, नेताओं के गंदे खेल से, कट्टरपंथियों से, बेरोज़गारी से, गोलियों से, ख़ून की नदियों से, ग़रीबी से, काफ़िरों से।
हम छीन के लेंगे आज़ादी।

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