जब सूख गया गुलज़ार के अल्फ़ाज़ों का तालाब। कल्लोल मुखर्जी

बात साल चौरानवे की एक दोपहर की है। गुलज़ार अपनी कुर्सी में बैठ अखबार पढ़ रहे थे कि उन्हें एक पत्र प्राप्त हुआ। पत्र पर नाम देखकर उनके चेहरें के भाव थोड़े बदल गए। इस नाम से उन्हें पहले भी पत्र मिल चुका था। उन्हें शायद यह भी पता था कि अंदर क्या लिखा है मगर फिर भी उन्होंने उस पत्र को खोला और जो सोचा था वही लिखा पाया। हाँलांकि उन्होंने उन पत्रों पर किये गए दावों को कई बार ठुखराया था मगर सामने वाले के शब्द बदलते ही नहीं थे।

अब उन्होंने पत्रों का जवाब देना बंद कर दिया। सामने से भी पत्र आने बंद हो गए।

एक साल बीत गया। एक दिन मशहूर फिल्मकार साई परांपये का संवाद प्राप्त हुआ। पूछने लगे, “तुम तकसीम के वक़्त कहाँ थे?”, “तकसीम के वक़्त तुम्हारे पिता कहाँ और तुम किसके साथ थे?” इस पर गुलज़ार ने जवाब दिया, “मैं अपने वालदैन के साथ देल्ही में था।” गुलज़ार ने इन अचानक पूछे जाने वाले सवालों का कारण पूछा तो जवाब मिला, “कोई इक़बाल सिंह है जो तुमसे मिलने चाहते है। कहते है तुम उसके छोटे भाई हो।”

फ़ोन कट गया। गुलज़ार चुप थे। गुलज़ार को लगा था जो पत्र उन्हें सरहद पार से किसी हरभजन सिंह, जो उन्हें अपना पिता बताते थे, से प्राप्त होता था वो थम गया मगर वे गलत थे। पत्र ने अब मुलाकार का रूप ले लिया था।

कुछ दिन बाद उन्हें मुम्बई के एक मशहूर अभिनेता, अमोल पालेकर का फ़ोन आया। उन्होंने भी वही सवाल पूँछे जो सई ने पूँछे थे मगर इस बार गुलज़ार ने कारण नहीं जाना बल्कि मुलाकात को राज़ी हो गए। गुलज़ार सोच में थे कि बंटवारे के वक़्त वे 11 साल के थे, इतने भी छोटे नहीं थे कि सब भूल जाए।

करीब ही देल्ही फिल्म फेस्टिवसल था और गुलज़ार वहाँ जाने वाले थे। हरभजन सिंह, उसकी पत्नी और बड़ा बेटा इक़बाल भी उस वक़्त देल्ही में थे। मुलाकात का समय, जगह और दिन जल्द ही तय हो गया।

मुलाकात का दिन आ गया। सई और अमोल पालेकर भी उस मुलाकात का हिस्सा हुए। उन्हीने हरभजन सिंह के पैर छूएं और चुप चाप जाकर सोफ़े पर बैठ गए। पहली बार गुलज़ार के अल्फ़ाज़ों का तालाब सूख सा गया था।

“वो दहशत भरी रात थी। गाँव का सरदार अफ़्सल मुसलमान था और हमारा बेहद करीबी था। उसने हमें आश्वाशन दिया था कि हमें कुछ नहीं होने देगा मगर सच कहूँ तो हमारी रूह कांप चुकी थी। हम भाग निकले। अपना घर, कारोबार, सामान, सब छोड़कर एक महफूज़ जगह की तलाश में निकल पड़े। कुछ दिन ऐसे ही चलते रहे, कहीं रुके, कहीं खाना खाया। हर तरफ खून खराब था। एक रात हम सो रहे थे कि एक दम हड़कंप सा मच गया। सुनने में आया मुसलामानों का एक बड़ा जत्था मियांवाली आ रहा था। भगदड़ मच गई। भगदड़ में ना जाने मेरी बेटी सत्या और मेरा छोटा बेटा सम्पूरन कहाँ गायब हो गए। हमने कश्मीर के रिफ्यूजी कैंप में भरसर उन दोनों को ढूंढने की कोशिश की मगर कुछ हाँथ नहीं लगा।”

“…अभी कुछ साल पहले अफ़्सल की मौत की चिट्ठी मिली तब ही सत्या का पता भी चला। सत्या ने बताया कि उस रात भगदड़ में वो कब दूसरे रास्ते चली गई उसे पता नहीं। तीन दिन तक वो हमें ढूंढती और तड़पती। उसकी तड़पन एक मुसलमान परिवार से देखा नहीं गया और उसे शरण दे दी। वक़्त बीत गया और धीरे धीरे उस मुसलमान परिवार के मालिक ने दूसरा निकाह रचाया और सत्या को अपनी बेगम बना लिया। वो उनकी हो गई और नाम सत्या से दिलशाद हो गया है।अब वो ख़ुशी से अपना जीवन बिताती है।”

“बेटा पुन्नी तू मान क्यों नहीं लेता जिस तरह सत्या ही दिलशाद है वैसे सम्पूरन ही गुलज़ार है। तू ही मेरा छोटा लड़का है।” अचानक ही हरभजन सिंह की पत्नी चिल्ला उठी और रोने लगी। गुलज़ार अब भी शांत थे।

“बेटा सम्पूरन, मैं यह नहीं कहता कि तुम इसे सच मानो और यह भी नहीं कहता कि गुलज़ार से हमारे सम्पूरन हो जाओ बस तुमसे एक बार मिलने की इच्छा थी, जो अब पूरी हो गई है।”

उस दिन गुलज़ार ना कुछ बोल पाये, ना हँस पाये और ना ही रो पाये। शब्दों का अकाल पड़ गया। जल्द ही खाना लग गया। सब मिलकर खाना खाये और मुलाकात का नाउम्मीद ही ख़त्म हो गई।

उस मुलाक़ात के बाद 7-8 साल तक कोई संवाद प्राप्त नहीं हुआ। गुलज़ार ने भी किसी संवाद की कोशिश नहीं की। फिर 1993 की एक सुबह गुलज़ार को इक़बाल सिंह (हरभजन सिंह के पुत्र) का पत्र प्राप्त हुआ, लिखा था हरभजन सिंह का इंतेक़ाल हो गया है। गुलज़ार के अल्फ़ाज़ों का तालाब फिर सूख गया। उन्हें लगा जैसे उनके दारजी ख़त्म हो गए।

“मैं रहता इस तरफ हूँ यार की दीवार के लेकिन,
मेरा साया अभी दीवार के उस पार गिरता है।”

“”बड़ी कच्ची सी सरहद अपने जिस्मों जां की है।।””

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तकसीम के वक़्त ना जाने ऐसे कितने ही परिवार बिछड़े और कितने ही खो गए। किसका बच्चा कौन अपनाया, कौन हिन्दू से मुसलमान बना और कौन मुसलमान से हिन्दू बना, कुछ हिसाब नहीं। हिसाब है तो इंसानियत का। इंसानियत ने ही एक बिछड़े को जीवन दिया, एक बिछड़े को अपनाया। धार्मिक बनने से पहले इंसान बने। जय हिंद।

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