जब “बिमल दा” ने कहा ज़िन्दगी “गुलज़ार” है। कल्लोल मुख़र्जी

“कल से यह कारख़ाने में काम करना छोड़ो और मेरे असिस्टेंट बन जाओ” जब गुलज़ार साहब ने यह वाक्य बिमल दा के मुँह से सुना तब शायद उन्हें जन्नत की प्राप्ति सा महसूस हुआ होगा। युवा गुलज़ार को जैसे उनकी मंज़िल दिख गई हो। गुलज़ार के नज़्मों को जैसे कोई पता मिल गया हो।

“अमृत कुम्भ की खोल” उपन्यास पर बिमल दा फ़िल्म बना रहे थे। अब गुलज़ार भी काफ़ी ख़ासा हो गए थे उनके, तो स्क्रिप्ट की ज़िम्मेदारी भी गुलज़ार के कंधों पर आ चुकी थी।

“गुलज़ार, यह जो मरीज़ बलराम अपना रोग छुड़ाने और सौ साल की उम्र के लिए कुंभ आता है उसे स्टेशन उतरते ही भीड़ कुचलने से मत मारो। आगे कहीं मारो। बहुत जल्दी मरता दिख रहा है।”

“जी दा” बिमल दा को सिगरेट का एक अलग जुनून था दिन भर धुआँ उड़ाते रहते थे और मना करने पर कान बंद कर लेते।

“आप यह फ़िल्म क्यूँ बनाना चाहते है बिमल दा?”

“मुझे भी सौ साल जीना है शायद इसलिए?”

“मतलब आप भी इन सब पर विश्वास रखते है? मगर फ़िल्म में तो..”

“सौ साल जीवित रहने से मेरा यह मतलब नहीं था।”

“बिमल दा को कैन्सर है, यह बात अभी उन्हें पता नहीं।” घटक बिमल दा के मैनेजर ने गुलज़ार को यह बात बताई तो गुलज़ार शायद रो पढ़े होंगे। उनके लिए बिमल दा एक पिता मूर्त थे।

“शायद अब यह फ़िल्म नहीं बन पाएगी।”

“गुलज़ार, सुनो इस साल कुंभ है हमें बलराम वाला सीन शूट करना है।” साल 1964 का था और कुंभ की शुरुआत 31 दिसम्बर और जोग स्नान 8 जनवरी को था। गुलज़ार अपने आँसुओं को अपने अंदर दबाए बिमल दा के साथ स्क्रिप्ट पर विचार करने लगे।

“गुलज़ार पता है, बलराम का किरदार मैं कुछ अपने सा देखता हूँ।” जैसे बलराम की मौत कुंब थी वैसे ही बिमल दा की शायद उनकी सिगरेट।

कुछ देर की शांत के बाद बिमल दा बोले, “ऐसा करो, बलराम को तुम तीसरे दिन मरते दिखाओ।”

दिन बीतते गए और बलराम के मौत का दिन पीछे जाता रहा। शायद बिमल दा को उनकी बीमारी का पता चल चुका था। तबियत बिगड़ती जा रही थी मगर बिमल दा का फ़िल्म को लेकर जोश और बढ़ता जा रहा था।

“मैंने अंत खोज लिया है। बलराम जोग स्नान के दिन सुबह सुबह जब सूरज की पहली किरण घाट पर पड़ेगी तब मरेगा।” गुलज़ार ने सब भूलकर ख़ुशी के साथ कहा।

“एक्सेलेंट।” यह सुनते बिमल दा किसी बच्चे की तरह ख़ुशी से उछाल पढ़े।

मगर फ़िल्म शूट नहीं हुई। सब इंतज़ार में रह गए और बिमल दा का इंतज़ार ख़त्म हो गया। आख़री बार उन्हें घटक दा ने रात को सिगरेट पीते हुए देखे और मना करने पर बिमल दा बोले, “परहेज़ कर भी क्या ही हुआ जो ना परहेज़ कर होगा?”

फिर वो बिस्तर से नहीं उठे। दिन था 8 जनवरी 1965. जोग स्नान का दिन। शायद गुलज़ार ने दो लाशें एक साथ देखी एक बिमल दा की और एक उनके किरदार बलराम की।

– कल्लोल मुख़र्जी

 

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