मृत्युलेख | कल्लोल मुखर्जी

 

प्यारी, हाँ यही नाम है मेरा। उम्र 24 साल है और दिल्ली में रहती हूँ। हाँ, दिल्ली में कहाँ ये बताऊँ या नहीं, समझ नहीं आ रहा है। वो नई दिल्ली रेलवे स्टेशन है ना, वहीं आस-पास कहीं रहती हूँ। वैसे दिल्ली आने का तो बचपन से ही शौक था मगर इस कदर आउंगी कभी सोचा नहीं था। कहते हैं, दिल्ली सपनों का शहर है और यह शहर किसी का दिल नहीं दुखाता, तभी तो दिल्ली को दिल वालों की दिल्ली कहते हैं, मगर मेरे जैसे कुछ बदनसीब भी हैं इस शहर में।

तो, कहानी की शुरुआत होती है 4 साल पहले, “नूरा” नाम के एक गाँव से, गाँव, यानि कि बहुत ही पिछड़ा गाँव। ऐसा गाँव जहाँ लोगों को अब तक बिजली भी ठीक से नसीब नहीं हुई है। हाँ, सुनने में अजीब लगता है कि दिल्ली से महज़ 100 किलोमीटर दूर, इस गाँव में बिजली नहीं है, मगर सच्चाई यही है। ज़्यादा आबादी नहीं है हमारे गाँव में, मुश्किल से 1000 लोग होंगे और इन 1000 में से 900 किसान।

मैं गाँव के पास बने पाठशाला में बारहवीं की पढ़ाई कर रही थी। आस-पास के 4-5 गाँव से बच्चे हमारी इस शाला में पढ़ने आते थे। पिछले कई सालों से पढ़ाई में अव्वल आती थी, तो इस बार उच्च-माध्यमिक में भी मास्टरजी और गाँव के सभी बड़ों को मुझसे काफी उम्मीदें थीं। मोमबत्ती की लौ में पढ़ाई करने में परेशानी भले ही होती थी, मगर मेरे सपनों के सामने यह लौ का अँधेरा भी हार मान जाए। सुबह शाला जाती, आकर माँ का खाना बनाने में हाथ बंटाती, पढ़ाई करती और फिर जब बाबा खेत से घर आ जाते तो खाना खाती और फिर देर रात तक पढ़ाई करती। कुछ यूँ ही मेरी ज़िन्दगी कट रही थी।

सपना था कि बारहवीं के बाद दिल्ली के किसी बड़े कॉलेज में दाखिला लूंगी और कलेक्टर बनकर अपने घर और गाँव से गरीबी दूर करुँगी। मुझे यह भी पता था कि मेरे सपनों के लिए बाबा और माँ ने अपना सब कुछ बलिदान कर दिया है। अक्सर, गाँव में लड़की का सातवीं के बाद ही विवाह हो जाता है, मगर मेरे बाबा और माँ मुझे पढ़ाना चाहते थे, मुझे कुछ बनता देखना चाहते थे। तभी गाँव वालों के लाख समझाने पर भी बाबा नहीं माने और दोगुना काम करने लगे और माँ भी शहर में बड़े घरों में नौकरानी का काम करने लगी। इन सब कठिनाइयों ने मुझे निराशा नहीं बल्कि और मेहनत करने की शक्ति दी. दिन-रात पढ़ाई कर मैंने उच्च-माध्यमिक परीक्षा बहुत अच्छे से दी और अब परिणाम का इंतज़ार था।

अब शाला जाना बंद हो गया था, तो हम सारे दोस्त हर शाम एक अनुपजाऊ खेत में खेलने जाया करते थे। आस-पास के गाँव के सभी लड़के-लड़कियाँ खेल कर ज़िन्दगी के फुर्सत के पलों का आनंद लेते थे। इस दौरान, मुकेश, जो मेरी कक्षा में ही पढ़ता था, उसके भैया, राकेश से मुलाकात हुई। सुना था कि राकेश दिल्ली में बिज़नस करते हैं और उनकी आस-पास के इलाकों में काफी इज्ज़त भी है। आखिर, किसानों के बीच कोई था जो बाहर शहर में काम करता था। राकेश छुट्टियों में घर आए थे और हर शाम जब हम खेलते, तो वहीं पास में बैठकर हमारा खेल देखते थे। दिल्ली में पढ़नेे जाने का लालच समझ लें या फिर उत्सुकता, ना जाने कब उनसे बात होने लगी। रोज़ खेल हो जाने के बाद उनके पास बैठती और दिल्ली के बारे में सवाल पूछने लगती और वो भी बड़े चाव से जवाब देते।

“दिल्ली कैसी है? वहां के लोग कैसे हैं? आप दिल्ली में क्या करते हो? आपने क़ुतुब मीनार देखी है? आपने दिल्ली में किस कॉलेज से पढ़ाई करी है? दिल्ली के कौन से कॉलेज अच्छे हैं?”

और भी काफी सारे सवाल, जिनका ना तो मुझसे, ना ही मेरी पढ़ाई से कोई नाता होता था। और गौर करने वाली बात तो यह थी कि वो भी इन बचकाने सवालों का जवाब बड़ी ही नज़ाकत से दिया करते थे। दिन बीतते रहे और हम नज़दीक आने लगे फिर एक दिन उन्होंने मुझसे कहा,

“इतना ही जानना है दिल्ली के बारे में तो दिल्ली हो आओ ना एक दिन।“

“जी, जाने का मन तो बहुत है, मगर बाबा कभी फुर्सत में रहते ही नहीं और माँ को दिल्ली के रास्ते पता नहीं।“

“अच्छा, तो फिर एक काम करो ना, मैं शहर वापस लौट रहा हूँ, बोलो तो तुम्हें ले चलूँ? दिल्ली घुमा दूंगा।“

“सच्ची? मगर माँ-बाबा जाने नहीं देंगे आपके साथ।“

“अरे, देखो उन्हें कुछ बहाना बना देना तुम और फिर हम सुबह दिल्ली घूमकर, शाम को घर वापस आ जाएंगे। क्या कहती हो?”

“हम्म, बात तो आपकी ठीक है। अच्छा मैं आपको सोच कर बताऊँ कल?”

“हाँ ठीक है। कल ही बता देना क्योंकि परसों मुझे शहर जाना पड़ेगा। “

“ठीक है, ठीक है।”

राकेश के दिल्ली घुमाने के प्रस्ताव से मैं एकदम खुश हो गई और ख़ुशी-ख़ुशी घर जाकर बहाने सोचने लगी। अंततः सुरभि के घर, उसके जन्मदिन मनाने जाने का बहाना सोच लिया। सुरभि का घर हमारे घर से दो गाँव छोड़ कर है और माँ-बाबा, दोनों ही उसके घर का रास्ता नहीं जानते, तो देरी होने पर वहाँ आकर पूछताछ भी नहीं कर सकते।

अगले दिन जब मैं राकेश से मिली, तो उसे पूरी कहानी बताई और घर से चोरी-छिपे, कुछ खाने को पोटली में बांध, अपनी गुल्लक से पैसे निकाल, सुबह-सुबह राकेश के साथ दिल्ली की बस में बैठ गई।

पूरे रास्ते मैं बोलती रही और राकेश मेरी खक्लन सुनकर उनका जवाब देते रहे। जैसे-जैसे बस आगे बढ़ती, मेरी उत्सुकता उससे कई गुना ज़्यादा बढ़ती। यह पीछे निकलते पेड़-पौधे मेरी ज़िन्दगी में आगे आने वाले सपनों को हवा दे रहे थे। यह हवाएँ मुझे मेरी मंज़िल की तरफ ले जा रही थीं। मेरा दिल्ली देखने का सपना और वहाँ पढ़ाई करना, कुछ हद तक सच होते दिख रहे थे।

देखते ही देखते हम हमारी मंज़िल पर पहुँच गए, यानी “दिल्ली”। बस से उतरी तो देखा कि सामने बड़ी-बड़ी ईमारतें है। इतनी बड़ी इमारतें कि एक ईमारत में ही पूरा गाँव समा जाए। लम्बी-चौड़ी, कंक्रीट की सड़कें और तेज़ रफ़्तार से भागती गाड़ियाँ, क्या शहर है दिल्ली!

“सुनो, अभी कुछ खुला नहीं होगा, तो एक काम करते हैं, मेरे घर चलते हैं, वहाँ नाश्ता करते हैं और फिर रिक्शे से घूमने निकल पड़ेंगे।’’

“ठीक है राकेश जी, जैसा आपको ठीक लगे।”

फिर हम राकेश के छोटे से घर में चले गए और राकेश बाहर बाज़ार जाकर मेरे लिए कुछ कचौड़ियाँ ले आया। मैं कचौड़ियाँ खाते-खाते, दिल्ली घुमने का प्लान बनाने लगी। प्लान बनाते-बनाते मुझे नींद आने लगी, शायद थकावट थी, तो मैंने सोचा कि क्यों ना आधे घंटे सो लिया जाए ताकि दिल्ली दर्शन के दौरान ताज़गी बनी रहे और मैं सो गई।

यह नींद और दिनों की तरह नहीं थी। आमूमन, अगर मैं कुछ सोचकर सोती हूँ, तो वक़्त पर उठ जाती हूँ, मगर इस दिल्ली की नींद ने मुझे ऐसा जकड़ा था कि मैं अपनी नींद पर काबू खो बैठी। आँखें खुली तो देखा कि मैं एक छोटे से कमरे के अन्दर हूँ। एक छोटी सी बत्ती टिमटिमा रही है और एक संकरा सा खाट है इस कमरे में। दीवारों पर फिल्म अभिनेत्रियों की फोटो लगी हुई हैं। मैं घबरा गई और जल्दी से जाकर दरवाज़ा खोलने की कोशिश करने लगी, मगर दरवाज़ा बाहर से बंद था। मैं और ज़्यादा घबरा गई और जोरों से, “राकेश! राकेश!” चिल्लाने लगी। कुछ देर तक ऐसे ही चिल्लाई और फिर थक कर बैठ गई।

कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला और दरवाज़े से एक आदमी अंदर आया। यह राकेश नहीं कोई और था। उसने आते ही दरवाज़े को अन्दर से बंद कर दिया। मैंने पूछा कि वो कौन है तो उसने कोई जवाब नहीं दिया और मेरी तरफ आगे बढ़ने लगा। मैं सिसकते-सिसकते पीछे हटने लगी, मगर उसने मुझे अपने हाथों से जकड़ लिया। मैंने चिल्लाने की भी कोशिश करी, मगर उसने मेरे मुँह में कपड़ा ठूस, मेरा मुँह बंद कर दिया था। मैंने हाथ पैर चलाये और उससे बचने की बेहद कोशिश करी, मगर शायद मेरी सुनने वाला वहाँ कोई नहीं था। मैं छटपटाती रही और वो शैतान मेरे कपड़े फाड़ता रहा। मेरी इच्छाएं, मेरी आशाएं, मेरी उम्मीदें, मेरी दुआएं आज उस आदम की हवस के सामने हार गई थीं।

राकेश ने मुझे बेच दिया था, मेरा शरीर बिक चुका था। कुछ आधे घंटे तक वो आदमी मेरे शरीर के साथ खेलता रहा और मैं रोती रही। वो हैवान मुझे नग्न अवस्था में छोड़, दरवाज़े से बाहर चला गया और मैं बस छोड़ देने की गुहार लगाती रही। अब बस मेरे साथ मेरा धड़, मेरी आत्मा और कुछ बूंद आंसू बचे थे। मैं रोती रही और अपने सपनों को अपनी आँखों के सामने से दूर जाता देखती रही।

रोज़ यह दरवाज़ा खुलता, हर बार नए चेहरे आते, हर बार मैं कतराती और अपने सपनो को दूर जाता देखती। तीन वक़्त की रोटी और सूखी सब्जी खाने को मिल जाती, ताकि मेरी साँसें चलती रहें। कई बार मरने की सोची, मगर माँ-बाबा का चेहरा सामने आ जाता।

अब इस शारीरिक प्रतारणा की मानो आदत सी पड़ने लगी थी। आँखों के नीचे का पानी, जिसे आँसू कहते हैं, सूखने लगे थे, विलुप्त होने लगे थे। मैं अब कतराती नहीं, चुप-चाप लेटी रहती, जैसे इन सब की मुझे आदत होने लगी थी। कभी बूढ़े, कभी जवान, कभी कॉलेज के छात्र, कभी नौकरी-पेशा आदमी, ये त्वचा की मंडी सबके लिए एक समान हो गई थी।

अब मैं सच्चाई को अपनाने लगी तो वहाँ, उस कोठे में मौजूद और भी लड़कियों से दोस्ती होने लगी। कोई इस मंडी में मेरी तरह बेच दी गई थी तो कोई अगवा कर उठा ली गई थी। एक मोटी औरत, जिसे सब आंटी बोलते थे, वो हमारे भाव लगाती। कभी 500 में बिकती तो कभी 300 में। कभी 10 ग्राहक आते तो कभी एक भी नहीं। अब मैंने खिड़की से झांकना और घ्राहकों को आकर्षित करना भी सीख लिया था। सीख लिया था या सिखा दिया गया था? खैर, इस बारे में चर्चा कभी और करेंगे।

करीब एक साल ऐसे ही बीत गया और चुनाव का वक़्त आ गया। अब तक बस मर्दों को अपनी कामुकता की प्यास बुझाते यहाँ आते देखा था, मगर पहली बार कुछ पुरुष, कुछ वादें करने आये। वादों ने तो दिल और दिमाग में नई उम्मीदों की चादर बना दी, मगर यह चादर फटी हुई निकली, जब यही मंत्री सत्ता की गद्दी पर बैठे।

इस बीच मैं आंटी से रोज़, बाबा-माँ से मिलवाने की बात करती। वो कभी चिल्लाती तो कभी प्यार से समझती। एक दिन वो थक-हार कर, मुझे मेरे गांव ले जाने के लिए राज़ी हो गई। शर्त यह थी कि बस दूर से ही उनके दर्शन करुँगी। मैंने कुछ पैसे भी इकठ्ठा कर लिए थे तो वो भी पोटली में बाँध कर, पूरी तैयारी के साथ गाँव को रवाना हो गई।

पूरे 2 साल बाद गाँव पहुँची तो देखा कि कुछ बदला नहीं था। मुँह को अच्छे से ढक, मैं और आंटी मेरे घर की तरफ बढ़े। मैं भावुक ना हो जाऊं इसलिए उन्होंने मुझे घर से दूर खड़ा रखा और दरवाज़े पर दस्तक देने लगी। वो अपने आप को जनगणना विभाग से बताने वाली थी, ताकि बाबा और माँ दोनों बाहर आ जाएं और कुछ वक़्त दें। घर को गौर से देखा तो समझ आया कि दीवारों पर काला रंग पुता हुआ है और कुछ अपशब्द लिखे हुए हैं। साफ़ था कि घर में माँ-बाबा के साथ गाँव वालों ने कुछ हरकत की है। बाबा-माँ इतने में बाहर आये तो मैंने देखा कि दोनों का शारीरिक गठन कमज़ोर सा हो गया है। कुछ देर तक निहारती रही और फिर आंटी वापस आ गईं। मुझसे रहा नहीं गया, तो जाते वक़्त मैंने गाँव के एक व्यक्ति से हमारे घर के बारे में पूछ लिया। उसने बताया कि इस घर की लड़की, यानि मैं, शहर जाकर वैश्या बन गई है इसलिए गाँव वालों ने बाबा और माँ का सामाजिक बहिष्कार कर, घर के बाहर कला रंग पोत दिया है। अब उनसे कोई बात नहीं करता। पता चला कि बाबा को टीबी की बीमारी हो गई है और इसके इलाज के लिए उन्होंने अपने सारे खेत बेच दिए हैं। मैं कुछ और पूछती कि आंटी ज़ोर ज़बरदस्ती कर मुझे वहाँ से दूर ले गई। मैं चाहती तो अपने मुँह से कपड़ा हटाकर अपनी पहचान दिखा सकती थी, मगर जिस गाँव में मुझे बहिष्कृत कर दिया गया है, वहाँ अपने आप को क्या साबित करती। मेरे इस कार्य से मेरे बाबा-माँ की मुसीबतें और ज़्यादा ना बढ़ जातीं। मैं बस में बैठकर वापस कोठे पर आ गई।

मैंने अब निश्चय कर लिया था कि जैसे भी हो, अधिक से अधिक धन इकठ्ठा करुँगी और घर भिजवाउंगी, ताकि बाबा का इलाज हो सके। अब हर महीने कुछ पैसे कोठे में चाय देने वाले राजू से भिजवाती और बाबा का हाल जानती। करीब एक साल तक ऐसा चला, मगर आज जब राजू वापस आया तो उसके हाथ में वो पैसे थे जो मैंने बाबा को देने को कहे थे। बीमारी से ग्रस्त बाबा का देहांत हो चुका था और माँ ने आत्महत्या कर ली थी। माँ-बाबा, जिनकी मैं कभी प्यारी प्यारी हुआ करती थी, अब वो नहीं रहे।

क्या-क्या सपने संजोए थे मैंने, कैसे-कैसे दिन काटे थे उनके साथ और अब वो नहीं रहे जिनके साथ कलेक्टर बनने का सपना देखा था और जिनके लिए मैं यह काम हँसते-हँसते कर, पाई-पाई जोड़ रही थी।

मैं सहती रही, मैं सहती रही इस समाज की ज़िल्लत। जब कोई रंडी, वैश्या, धंधे वाली बोलता है, तो उसका दर्द शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। समाज में हम जैसों की कोई नहीं सुनता, कोई हमे इंसानों में नहीं गिनता। हमारे भाव, अभिव्यक्ति का कोई मोल नहीं है। जैसे हम सब यहाँ अपनी मर्ज़ी से आते हों। आज मेरा मौत से डर समाप्त हो चुका है। मेरी जीने की वजह भस्म हो गई है। मौत से पहले, इन चंद लम्हों में मेरी उस बेईमान ईश्वर से यही गुज़ारिश है कि मेरा यह लेख जो कोई भी पढ़े, हम जैसों के बारे में एक बार नज़रिया दोहराए। अगर किसी एक का भी नज़रिया बदल जाए, तो मैं अपना जीवन सार्थक मानूंगी।

बहुत बड़बड़ा लिया, अब चलना चाहिए। मौत मेरा इंतज़ार कर रही है। फाँसी का फन्दा मुझे अपनी तरफ बुला रहा है। फिर मुलाकात होगी, किसी और दुनिया में। बस दुआ करना कि अगले जन्म मुझे ऐसा जीवन ना नसीब हो।

“नीलाम इस कदर हुई मैं, कि अश्कों का भी भाव लग गया,

मौत से पहले मिले ज़ख्म कई बार, जैसे मौला मेरा नाराज़ हो गया।”

Picture Credits – Sandra Hoyn

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2 comments

  1. एक दिल होता है कलाकार का

    और तेरे पास वो दिल है एहसास कुछ ऐसा हुआ कहानी पढ़ते वक्त की जो लफ्जो मैं बयान न हो सकता हो

    Liked by 1 person

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