क्या “प्यासा” की “प्यास” बुझ गई?

कल रात मैंने एक फिल्म देखी, जिसे लिखा था अबरार अल्वी जी ने एवं निर्देशन और अभिनय किया था गुरु दत्त साहब ने , फिल्म का नाम था “प्यासा”।
फिल्म की कहानी एक लेखक की है जो प्रकाशकों के इर्द गिर्द चक्कर लगाता है ताकि उसकी लिखी नज्मों को एक मंच मिल सके। प्रकाशक उनकी नज्मों को सिर्फ़ इसलिए ठुकराते हैं क्योंकि वो किसी लोकप्रिय लेखक ने नहीं लिखी हैं, बाकी नज्मों में जान और विद्रोह दोनों भावनाएं कूट कर भरी होती हैं।
गुरु दत्त साहब पूरी फिल्म में दर्शकों से चीख-चीख कर यह कहते रहे कि देखिये एक लेखक या एक कलाकार के लिए उसकी कला की क्या कीमत होती है और यह कीमत चुकाने के लिए उसे क्या-क्या कुर्बानियां देनी पड़ती हैं| साहित्य ठेले में बिकने वाली सब्जी नहीं कि पैसे दिए और आप सहित्यकार बन गए, बल्कि साहित्य समंदर की लहरों की तरह है जो आपको आकर्षित भी करती और अपनी छाप भी छोड़ जाती है।
बहुत अच्छा है कि गुरु दत्त साहब और अल्वी जी ने यह फिल्म 1957 में ही बनाई क्योंकि आज ऐसी फिल्में शायद लोगों को समझ नहीं आती। साहित्य का व्यवसायीकरण हो गया है, और हो भी क्यों ना? सब रोटी तोड़ें और साहित्य भूखा मरे ऐसा तो नहीं हो सकता? पर अगर भूख से ज्यादा खा लें तो? भूख से ज्यादा खा लें तो बदहज़मी हो जाती है और हमारा साहित्य और सिनेमा दोनों इस बदहज़मी के दौर से गुज़र रहे हैं।
लेखक लिख रहा है मगर क्या लिख रहा है और क्यों लिख रहा है उसे नहीं मालूम मगर लिख रहा है। फिल्म बन रही है, क्यों बन रही है, किसको केन्द्रित कर बन रही है नहीं पता मगर बन रही है। जनता पढ़ रही है, जनता देख रही है मगर क्यों? उन्हें नहीं मालूम बस पढ़/देख रही है।
साहित्य आज कॉलेज के गेट के भीतर लड़का-लड़की के इश्क में कैद है। क्यों? इश्क किसी साठ साल के मजदूर परिवार में नहीं है? है। मगर वो बिकता नहीं है। क्या कारण है साहित्यकार अपनी सोच को उस घेरे से बाहर नहीं ला पा रहे?
ताली एक हाथ से नहीं बजती है।
प्रकाशकों ने भी एक नई चीज़ का आविष्कार किया है और इसे नाम दिया है “SELF PUBLISH” यानी अगर आपने कुछ लिखा है और आप उसे छपवाना और बिकवाना चाहते हो तो इतने पैसे दो और छपवा लो। मगर क्यों छापी जा रही है? और यह किताब साहित्य की कितनी प्यास बुझाएगी शायद यह ना तो उस लेखक को पता होता है और ना उसके प्रकाशक को।
किताब छाप जाती है, प्रकाशक अपना मुनाफा कमा लेता है और लेखक ऑथर बन जाता है मगर क्या उसके कंटेंट की सच्चाई और साहित्य की प्यास क्या बुझ पाती है?
साहित्य का शोषण मत कीजिये। साहित्य के नाम पर खुद की रोटी मत तोड़िए। साहित्य एक शक्ति है इसे नष्ट मत कीजिये।
अंत में यह चार पंक्तियाँ साहिर लुधियानी जी के कलम से उन प्रकाशकों, लेखकों और फिल्मकारों को समर्पित।
“ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया,
ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनिया,
ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनिया,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है।“
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