“पोस्ट ट्रूथ भारत में मोदी सरकार अनगिनत चुनाव जीत लेगी।”

कल मोदी सरकार के तीन साल पूरे हो जाएँगे और जनता के टैक्स के करोड़ो उड़ा दिए जाएँगे। मोदी सरकार के इन तीन सालों की उपलब्धि की बात भी होगी मगर सिर्फ़ उसी अंदाज़ से जिस अंदाज़ से वे हमें सुनाना पसंद करेंगे।

ऐसा बिलकुल नहीं है कि तीन सालों में कुछ काम नहीं हुआ है। ऊर्जा और सड़क निर्माण के छेत्र में सरकार ने बहुत ही अच्छे काम किए है, मगर फिर भी हमारे टीवी, रेडीओ, अख़बारों में सरकार के गुण ऐसे गाए जाएँगे जैसे इससे पूर्व तो कुछ काम हुआ ही नहीं था और सारी क्रांति इन तीन सालों में ही हुई।

ख़ैर “पोस्ट ट्रूथ” युग में हम और क्या उम्मीद कर सकते है?

जब जनता की नज़र सच, तथ्यों, आँकड़ों पर धुँधली और भावनाओं पर तीखी हो जाती है तब एक नए सच का जन्म होता है। यह सच झूठ को सच में तब्दील करने की क्षमता लिए होती है। भावनाओं में बहकर जब किसी वाक्य से सत्य खो जाए तब पोस्ट ट्रूथ का जन्म होता है। एक ऐसा सच जो सच के आगे और झूठ के भावनात्मक सच का पर्याय है।

बुद्धिजीवियों और विशेषज्ञों की माने तो पोस्ट ट्रूथ युग में किसी भी देश को ले जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण भागीदार उस देश की मीडिया है। पूँजीवाद की बाढ़ में जब मीडिया, जिसे सच का एक प्रतिबिंब माना जाता है वो राजनैतिक दलों के साथ सम्बंध जोड़ लें तब ख़बरों में तथ्यों की जगह रिश्तों की बू आने लगती है।

“डर” सिर्फ़ एक शब्द है मगर अपने अंदर बहुत से जटिल भावों को लपेटे हुए होती है। जब मीडिया और दलों की साझेदारी अपने रिश्तों की बू को छुपाने डर का सहारा लेने लग जाए तब दर्शकों के मन में विचित्र भावनात्मक शक्ति का जन्म होता है, जिसके चलते झूठ को सच बना दिया जाता है। यह बहुत ख़तरनाक है क्यूँकि भावनात्मक लोग झूठ को सच मानने लग जाते है और उस झूठे सच के आधार पर देश की स्तिथि को आँकने लग जाते है।

जिस तरह अमरीका में पोस्ट ट्रूथ का श्रेय ट्रम्प सरकार को जाता है ठीक वैसे ही भारत में पोस्ट ट्रूथ को लाने का श्रेय मोदी सरकार को जाता है।

भारत में हिंदू बहुसंख्यक है अतः “हिंदू धर्म ख़तरे में है।” से पूरे हिंदू समुदाय के अंदर एक भावनात्मक डर पैदा किया जा सकता है। इस डर के उपयोग से सरकार जनता के सामने एक ढाल बना देती है जिससे सरकार, लोगों का एक भावनात्मक विश्वास जीत लेती है। “गौ रक्षा, राम जन्म भूमि, लव जिहाद आदि ऐसी समस्याएँ, जो दरसल समस्या हैं ही नहीं, इस भावनात्मक विकार को और जटिल बनाने में भागीदार बनती है। और उसी का परिणाम अख़लाक़, भूरा जैसे हज़ारों निर्दोष नागरिकों की हत्या और योगी आदित्यनाथ जैसे कट्टरपंथ का मुख्य मंत्री बनना है।

भारत की असली समस्या ग़रीबी, शिक्षा, बेरोज़गारी, रेप, भुखमरी, करप्शन, स्वास्थ, पर्यावरण, कृषि इत्यादि है मगर पोस्ट ट्रूथ से जन्मी समस्याओं ने बहुत आसानी से असल समस्याओं की जगह ले ली है।

अब भी वक़्त है भावनाओं को दूर रखकर विवेक से काम लें। तथ्यों और भावनाओं में फ़र्क़ करें। अंध भक्त ना बने। झूठे विज्ञापनों और मार्केटिंग से बचें। उपयोग किए जाने से बचें और एक अच्छा और सच्चा देश बनाएँ।

पोस्ट को अपने मित्रों, भाई बहनों के साथ साझा करें, पोस्ट ट्रूथ का ज्ञान दें और उसके परिणामों से अवगत कराएँ।

जय हिंद।

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