तुम, मैं और दिल्ली यूनिवर्सिटी । कल्लोल मुख़र्जी

 

करीब 35 साल हो गए तुझसे मिले, आज फिर वहीं आ गया हूँ जहाँ मैंने अपनी ज़िन्दगी के सबसे बेशक़ीमती 3 साल गुज़ारे थे। तेरी याद ना आये इसलिए वापस शहर नहीं आया मगर कहते हैं ना कि अतीत से जितना दूर भागो, वो उतना ही आपको जकड़ लेता है। तेरी यादें मुझे आज फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी के गलियारों तक ले आयीं। आश्चर्य है किस तरह माहौल बदला है, उस वक़्त सिर्फ तुम, मैं और इस यूनिवर्सिटी की चार दीवारी हुआ करती थी और हमें साथ वक़्त बिताने के लिए जगह ढूँढनी पड़ती थी मगर आज देखो कितनी सुविधाएं उपलब्ध हैं। जगह जगह पर सीसीडी और केएफसी हैं। आज दस मिनट बात करने के लिए 100 की चाय और 90 का मोइतो खरीदना पड़ता है मगर उस वक़्त 2 वाली कुल्लड़ की चाय और 1 का निम्बुपानी ही घंटों बातें करने के लिए काफी हुआ करता था। तुम्हें याद तो होगा किस तरह हम क्लास बंक कर के सी.पी आया करते थे और उस धूप में भी हाथ में नारियल पानी लिए सेंट्रल पार्क में घंटों बातें किया करते थे। आज तो विज्ञान ने मोबाइल, व्हाट्सएप्प, फेसबुक सब बना दिया है, अपने कमरे में ए.सी के नीचे बैठ घंटों बातें करो। आज नौजवानों के पास महंगी गाड़ी व बाइक हैं मगर हाथ में हाथ रखकर रिक्शा से घर से यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी से घर जाने का मज़ा कहाँ?

रीगल सिनेमा तो याद होगा? और वो टॉकीज़ भूल भी कैसे सकते हैं हम, अमिताभ बच्चन की फ़िल्म का पहला शो देखने के चक्कर में तुम्हारे चाचा ने जो हमें साथ में देख लिया था। डर तो बहुत लगा था मगर तुम्हारे चाचा ने मानो हमें स्वीकार कर लिए था।
देबांगना तुम्हें याद है जब हमने फैसला कर लिया था साथ रहने का और अपने माता पिता को आपस में मिलाने का? कितना डर लगा था ना? मुझे आज भी याद है जिस दिन पहली बार मैं तुम्हारे घर तुम्हारे माता पिता से मिलने आया था, तुम्हारे पिताजी मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैं कोई आतंकवादी हूँ, और मैंने उनसे तुम्हारा हाथ नहीं बल्कि कश्मीर मांग लिया हो।

खैर, हमारे प्यार के आगे किसी की नहीं चली और अंततः सब राज़ी हो गए। इसी बात की ख़ुशी में मैं और तुम कैंडल नाईट डिनर पे गए थे मगर किसे पता था कि वो डिनर हमारा साथ में आखिरी डिनर होगा। खाना ख़त्म हुआ ही था कि कुछ हथियार बंद लोग होटल में घुस गए और अंधाधुंध गोलियां चलाने लगे। तुम हाथ धोने वाशरूम गई थीं और मैं बिल दे रहा था मगर एकाएक ही सारी चहल पहल कब्र में दफन हो गई। मैं टेबल के पीछे छुप तुम्हें ढूंढ रहा था मगर तुम नहीं दिखी। कुछ देर बाद सब शांत हुआ, मगर यह शांति किसी अघटन की तरफ इशारा कर रही थी। मैंने चिल्लाया ” देबांगना.. देबांगना ” मगर कोई जवाब नहीं मिला। डर और घबराहट से मैं बेहोश हो गया था।

आज मै उसी होटल के सामने खड़ा हूँ और तुम्हारी याद में रो रहा हूँ, मगर किसी को कोई परवाह नहीं। तभी पीछे से दो पहलवान आये और मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए गए।

” सर.. सुधीर पकड़ा गया है।”

” शाबाश, हमसे भागकर कहाँ जाएगा?”

“अभी खाँचे में भरकर पागलखाने ले आते हैं। ”

हाँ! पागल हूँ मैं। अगर तुझे प्यार करने से मुझे लोग पागल कहे तो पागल हूँ मैं। देख तेरी याद ने मुझे पागल बना दिया है। तेरे प्रति मेरा स्नेह लोगों को पागलपन लगता है। मुझे कोई नहीं समझता, मेरी बात कोई नहीं मानता।

सब हँसते हैं मुझ पर कहकर कि पागल हूँ मैं। उस रात तू चली गई मुझे अकेला छोड़ कर, मुझे भी ले चलती साथ में। यहाँ नहीं तो ऊपर ही सही, हमारा प्यार जीवित तो रहता।

 

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