इंटरव्यू । कल्लोल मुखर्जी

 

“स्वीटी सहाय?”

“जी।”

“बैठिये, आप किस पोस्ट के लिए इंटरव्यू देने आईं हैं?”

“चपरासी।”

“पढ़ाई कहाँ तक की है आपने?”

“आठवीं।”

“मगर चपरासी की पोस्ट के लिए तो हमें बारहवीं पास चाहिए।”

“जब देश के मंत्री दसवीं पास होकर देश चला सकते हैं, तो फिर मुझे तो झाड़ू-पोंछा और फाइलें इधर-उधर ही ले जानी हैं और मुझे नहीं लगता कि यह सारा काम बारहवीं में सिखाया जाता होगा।”

“ठीक। तो आपने पहले कहीं काम किया है?”

“जी नहीं। पहली बार सोचा कि अपने साथ कुछ अच्छा कर लूँ।”

“आपकी उम्र कितनी है?”

“यही कोई सत्ताईस या अट्ठाइस होगी।”

“तो आप पहले क्या काम किया करती थीं?”

” पहले.. हम्म.. यही, लोगों के घर खुशियाँ बाँटना और कभी-कभी जब पैसे नहीं हुआ करते थे तो खुद को बेचा भी है।”

“काफ़ी साहसी हो।”

“हाँ, दूसरों से अलग जो हूँ। वो क्या कहते हैं आपकी भाषा में, एकदम डिफरेंट। और साहसी तो मुझे मेरे हालातों ने बनाया है।”

“आपकी यह डिफ्रेंटनेस दफ्तर के कर्मचारियों को आप से दूर ले जा सकती है। लोग घृणा करेंगे आप से, तब?”

“सुना था कि दफ्तरों में कर्मचारी का मोल उसके काम से होता है ना कि उसके अलग होने से, और रही बात घृणा करने की तो उसकी तो आदत सी है अब मुझे।”

“आप कितना कमा लेती थीं पहले?”

“यही, महीने का दस हज़ार करीब”

“अच्छा, मगर हम आपको सिर्फ साढ़े पांच हज़ार ही दे पाएंगे।”

“मंज़ूर है।”

“मगर यह तो आपकी पिछली कमाई का लगभग आधा है, फिर?”

“इज्ज़त के आगे पैसे का कोई मोल नहीं। पैसे तब तक ही ज़रूरी होते हैं, जब तक पेट भरना हो। बाकी इज्ज़त ही है जो आपको लोगों से जोड़ती है, आपको समाज में एक दर्जा देती है और मैं इज्ज़त की खातिर ही यहाँ आई हूँ।”

“अच्छा आपने बताया कि आपने कई बार खुद को बेचा है, कहीं यहाँ भी तो…”

“हाहा। सर, उस मंडी में ना बिकने के लिए ही तो मैं यहाँ आई हूँ और आप मुझे बाज़ारू समझ बैठे। सर, यह मज़ा नहीं सज़ा है। यह एक ऐसा खेल है जो मुझ जैसे हज़ारों के साथ रोज़ खेला जाता है और हम ना चाहते हुए भी अपनी झोली खोल लेते हैं जिससे कुछ पैसे आ जाएं और पेट पल जाए। सरकार और समाज ने तो हमें ऐसे दरकिनार कर दिया है जैसे हम यह रोग जानबूझकर इस धरती पर लेकर आये हों।”

“मैं समझ सकता हूँ।”

“नहीं आप नहीं समझ सकते। आप हम लाखों में एक नहीं हैं। आपको वो दर्द नहीं होगा जो मैं रोज़ झेलती हूँ। बस सिर्फ एक गुहार है, अगर आपको लगे कि मैं यह काम करने लायक हूँ तो मुझे रख लीजिए। शायद, फिर कभी इतनी दूर आने की हिम्मत ना हो पाये।”

“जी ठीक है, आप बाहर जाकर बैठिए, आपको जल्द ही सूचित किया जायेगा।”

“शुक्रिया।”

कुछ और लोगों के इंटरव्यू के बाद इंटरव्यू के परिणाम घोषित हुए और स्वीटी सहाय का चयन चपरासी के पद के लिए हो गया। स्वीटी बहुत खुश थी, आखिर उसकी ज़िन्दगी बदलने वाली थी। वो समाज में एक अलग दर्जा पाने वाली थी। वहीं कंपनी के कर्मचारियों की सूचि में एक नए नाम के साथ, “मेल” और “फीमेल” के साथ एक नया लिंग भी जुड़ गया, “ट्रांसजेंडर”।

किन्नरों को पहचान दिलाने की लड़ाई में स्वीटी एक और कदम आगे बढ़ गयी थी।

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