अनछुआ प्रेम । कल्लोल मुख़र्जी

 

मैं उसका नाम नहीं जानता। ना ही मैं ये जानता हूँ कि वो क्या करती है? कहाँ रहती है? कहाँ से आती है और कहाँ जाती है? मगर फिर भी मैं उससे परिचित हूँ। हज़ारों अधमरी लाशों के बीच जब घड़ी में पौने आठ बजते हैं और दफ़्तर की भीड़ घर को निकलती है, वो मुझे क़रोल बाग़ मेट्रो पर अपनी बारी का इंतज़ार करती दिखती है।

मैं भी इंतज़ार करता हूँ, मेट्रो का नहीं, उसका; ताकि मैं उसके साथ एक ही डब्बे में चढ़ सकूँ। शायद वो अपनी बारी का इंतज़ार नहीं करती, मेरा करती है। शायद उसे लगता हो कि हमारी रोज़ रोज़ की मुलाक़ात एक संयोग मात्र है या फिर उसे सब पता है और अनजान बनने की कोशिश करती है।

कंधे पर ज़िम्मेदारियों का बस्ता और माथे पर चिंता की लकीरें लिए लोग मुस्कुराते नहीं मगर वो मुस्कुराती है। रोज़ मुस्कुराती है। ना जाने इतनी थकान के बाद कैसे मुस्कुराती है? उसकी मुस्कान का मुझे लोभ है। उसके दोनो होंठों के बीच रगड़ से बनी लकीरें मेरे दिन भर की थकान मिटा जाती हैं। मैं आँखें बंद करता हूँ और रोज़ हज़ारों यात्रियों के सामने उसे चूमता हूँ। हमारे होंठ टकराते हैं और मैं एक ऐसी दुनिया में प्रवेश करता हूँ जहाँ मैं ख़ुद को इस क़ैद से मुक्त, आज़ाद ढूँढता हूँ। वक़्त रुका हुआ सा है और मैं उसके होंठों के रस से लबालब भरा हुआ सा हूँ। स्फूर्ति उबलने लग जाती है और मेरे अंदर एक कंपकंपी मचने लगती है। क्या यह प्रेम है? उसके होंठों से मेरे होंठोंका प्रेम? अनछुआ प्रेम?

मैं उसे अपने होंठों की इस हालत की ख़बर देना चाहता हूँ। मैं उसके होंठों का सुख भोगना, उस बेफ़िक्र महफ़ूज़ दुनिया में अनिश्चित काल के लिए खोकर, गुम हो जाना चाहता हूँ। होंठों की चुंबकीय शक्ति में आ रही रुकावट को तोड़ना चाहता हूँ। मेट्रो में हज़ारों यात्रियों को पल भर में ग़ायब कर देना चाहता हूँ। उसके होंठों में सूखे पड़े सुख को चूसकर मुक्त हो जाना चाहता हूँ। इन सब के बावजूद मैं उस रेशम के धागे को तोड़कर चिपकना नहीं चाहता। मैं प्रेम करता हूँ, मेरे प्रेम को हवस का नाम देना प्रेम का, उस जादुई अनुभव का घोर अपमान है।

तीन दिन से मुझे उसकी होंठों का स्पर्श नहीं हुआ। अजीब सा है सब कुछ। मेरी थकान की कोई सीमा नहीं है। मैं किसी शराबी सा महसूस कर रहा हूँ जिसके नशे का प्रबंध रुक गया है। मुझे उससे बात कर लेनी थी। होंठों की ज़ोर ज़बरदस्ती को डाँटकर कुछ जान लेना चाहिए था। वो कहाँ रहती है इतना जान लेता तो ही काफ़ी होता। ना जाने अचानक कहाँ ग़ायब है? शादी तो नहीं कर ली उसने? नौकरी तो नहीं छोड़ दी उसने?

आज चौथा दिन है। वक़्त वही है और शायद क़द काठी भी उसी की है। मगर उसके वो होंठ कहाँ है? उसने दुपट्टे से अपना चेहरा ढंक क्यूँ रखा है? क्या आज उसे मुस्कुराना नहीं है? क्या आज वो मुझे चूमेगी नहीं? वो ऐसा क्यूँ कर रही है? मुझे क्रोध आ रहा है। मन अशांत हो रहा है।

दुपट्टा हटा दूँ?

वो मुझे देख रही है। एकदम टकटकी लगाकर देख रही है। पहले कभी ऐसे नहीं देखा है उसने। उसकी आँखों में मेरे लिए नशा झलक रहा है। मगर फिर क्यों उसने होंठ, अपने चेहरे को पर्दे के पीछे छिपा रखे हैं?

वो धीरे धीरे मेरे क़रीब आ रही है। उसे शायद मुझसे कुछ कहना है। शायद उसने अपने होंठों को मेरे लिए ही छुपा रखा है। कहीं उसे भी मेरे होंठों से प्रेम तो नहीं हो गया? क़दम धीरे धीरे मेरी तरफ़ आ रहे है और मेरे होंठों की प्यार और शरीर की गर्मी बढ़ रही है।

तभी स्टेशन आया और उसने मेरा हाथ पकड़कर अपने साथ नीचे उतार लिया। स्टेशन सुनसान है, जैसे शमशान हो। उसे इस अंधेरे, अकेले स्टेशन में मुझसे क्या चाहिए? चुंबन? उसके हाथों की जकड़ अब भी मज़बूत है। हम अब स्टेशन के एक किनारे में है। मेरी आँखें उसकी आँखों में कहीं खो चुकी हैं।

उसका हाथ उस दुपट्टे पर जाता है जिसने उसके चेहरे को ढंक रखा है और एक झटके में दुपट्टा हटा दिया जाता है।

मेरे शरीर का ख़ून एकदम से ठंडा हो गया है। कंपकंपी पसीने में बदल गई है। कानों में एक अजीब सी गूँज सुनाई पड़ने लगी है। मेरे होंठों का रस सूखकर बंजर हो गया है। उसके आँखों से निकल रहे आँसू जले हिस्सों से गुज़रकर, दर्द को अपने साथ लपेटकर मेरे पैरों पर किसी अग्निपिंड से निशान छोड़ रहे है। वो जल्दी से अपने आँसुओं को पोंछतीं है, दुपट्टे से अपने दर्द को छुपाती है और भागकर ख़बरों में कहीं ग़ायब हो जाती है।

उसके रस से भरे होंठों जल गए हैं। अब उन होंठों की रगड़ से कोई नक़्शे नहीं बनते। गाल के पास का माँस जलकर हड्डियों के खंडहर में बदल गया है। चेहरे का मानचित्र कोरे काग़ज़ में बदल गया है। ख़ूबसूरती ने “ख़ूब” के बदले “बद” लगा लिया है। एक विदभत्स रूप उसके चेहरे का हो गया है। उसके चेहरे का हर जला हिस्सा चीख़ चीख़ कर मुझसे सवाल कर रहा है।

क्या यह प्रेम है? ऐसी कौन सी चाहत दिलरुबा के नक़्शे बदलने को आमादा होती है? क्या प्रेम ख़ूबसूरती को क़ैद करना सिखाता है? क्या प्रेम मुस्कान को जला सकने जितनी शक्तिशाली है?

किसी के प्रेम को हासिल कर लेने के लिए अगर रसायन का उपयोग करना प्रेम का चरित्र है और इस प्रेम में सब जायज़ है तो मुझे प्रेम नहीं करना। मैं प्रेमी नहीं हूँ। मेरा प्रेम से कोई वास्ता नहीं है।

अब वो मेट्रो में नहीं आती और आए भी कैसे? उसकी भी कोई उम्मीद रही होगी, कुछ सपने, कुछ आशाएँ उसके आँखों में क़ैद रही होंगी जो अब जल कर राख हो गए। आज भी उसकी तलाश में उसी डिब्बे में उसी वक़्त चढ़ता हूँ, मगर वो नहीं दिखती। बस उसकी सलामती जान लेने के लिए आँखें टटोलता हूँ। यह प्रेम नहीं है और ना ही मुझे अब उसकी तलाश है।

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