आँखे | कल्लोल मुख़र्जी

उसकी आँखे एक मधुशाला है। शराबियों का घर यहीं बसता है। रातें यहीं कटती है। आस-पास पड़े गड्ढे मधुशाला में आए शराबियों की भीड़ का प्रमाण है। मुझे भी एक शराब की तलाश है। मैं उस मधुशाला में कहीं खो जाना चाहता हूँ। मैं भी एक नशा करना चाहता हूँ। सबसे कड़वा नशा झेलना चाहता हूँ। जिसे उसने दिल में कहीं छिपा रखा है, मैं उसको पी मदहोश हो जाना चाहता हूँ। दूसरों का नशा, मधुशाला में उलटियों के नाले भर देता है मगर यह ख़ास नशा उन उलटियों को सोखता है। मैं उसकी आँखों में जमी मवाद को चूस लेना चाहता हूँ।

वो काजल लगा उन मवाद को छुपाती है, उन निशाओं को दबाती है जो सच है। वो सच छुपाकर एक नया सच बनाती है। शायद सच छुपाकर ही वो हँस पाती है मगर उसकी आँखे मुझे उसका सच बोल देती है। उसका सच मुझे दिखता है, क्या पता बाक़ियों को उसकी आँखों में वो सच क्यूँ नहीं दिखता? वो आख़िर सच छुपाती ही क्यूँ है?

वो दरवाज़े बंद करती है और दीवारें खोल देती है। मैं उन दीवारों को उजड़ने से रोकना चाहता हूँ। अंधेरी काली आँखों में कुछ एक रंग भरना चाहता हूँ। मैं वो शराब को हासली कर उस मधुशाला को भस्म करना चाहता हूँ। वो कपड़े पहनकर भी मुझे निर्वस्त्र क्यूँ दिखती है? मैं उसे कपड़े पहनाना चाहता हूँ।

“छोटू, 40 नम्बर कोठे में नई वाली को चाय दे आ और ज़रा देखकर वो बोल-देख नहीं सकती।”

वो बोल नहीं सकती तभी अपनी आँखों से इतने अल्फ़ाज़ बहाती है। मुझे उसकी आँखों में मधुशाला नज़र आता है मगर शायद असकी आँखे मधुशाला नहीं बनना चाहती। मैं उसकी आँखों में क़ैद होना चाहता हूँ मगर वो तो ख़ुद अपनी आँखों में क़ैद है। ज़ंजीरों में बंधी हुई किसी रात के सूरज की तलाश में। क्या मैं उसे कभी रौशनी की किरणों से मुलाक़ात करवा पाउँगा? उन बादलों से आगे ले जा पाउँगा?

“छोटू! बहरा गया है क्या? जल्दी भाग!”

“जी, मालिक।”

(रेने मगरिट्टे की मशहूर पेंटिंग “दी फ़ॉल्स मिरर” का निर्वचन एक कहानी के रूप में)

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