होलिका दहन | कल्लोल मुखर्जी

खिड़की से हंगामे की आवाज़ आ रही है, लोग चिल्ला गा रहे हैं। आज होलिका रात है। कमरे में ठंडी हवा का प्रवाह है और ये हवा मेरे रूह के तापमान को महसूस करा रही है। हवा के कारण कमरे में जल रही बत्ती किसी झूले सी झूल रही है और इन परछाइयों के घड़ी पर पड़ने पर वक़्त का पता चल रहा है।

कल होली है। मोली की माँ और मेरी भाभी की पाँचवीं पुन्यतिथि। पांच साल पहले की घटना को याद करती हूँ तो कमरे में गर्मी बढ़ जाती है। भैया कुछ काम नहीं करते और शायद इसलिए हमारा घर भी क़र्ज़ पर चढ़ चुका है। भैया ने पहले भी क़र्ज़ को चुकाने के लिए यह व्यापार किया था और कल भी यह व्यापार दोहराएंगे। नींद उड़ चुकी है और मेरी आँखें अब सिर्फ मोली को ही घूरे जा रही हैं, जो पलंग के एक किनारे बैठ अपने खिलौनों से खेल रही है। शायद इसे आखरी बार देख रहीं हूँ।

”दस हज़ार.. बस इससे कम नहीं।”

”मुझे खुद दस मिलता है। आपको दस दूँगा तो खुद क्या कमाऊंगा?”

”आपने सामान देखा है ना? मैं दावे से कह सकता हूँ कि इसका अच्छा मोल मिल जायेगा आपको।”

”अभी मंदी का वक़्त है। रेट गिर गए हैं। आप समझिये।”

”अच्छा तो चलिए नौ हज़ार। इससे एक और कम नहीं।”

”ठीक तो कल पैसे देकर सामान दे जाऊंगा।”

आज दोपहर भैया को ये बातें करते सुना तो पाँच साल पहले का हादसा याद आ गया। व्यापार पाँच हज़ार में तय हुआ था और भाभी ने इसका बहुत विरोध किया था। वो पुलिस को बताने और हंगामा करने की धमकी देने लगी थी। एक चीख निकली और अगले दिन भाभी और उनकी बच्ची तूली नहीं दिखी। भैया बोले कि सुबह भाभी तूली को लेकर पहाड़ों में गई थीं तो पैर फिसलने से खाई में गिर गई, मगर सच यह नहीं था। भाभी का खून और तूली का व्यापार कर दिया गया था।

पहाड़ी इलाके जितने खूबसूरत दिखते हैं उतने ही रहस्य अपने अन्दर गहराई में दबोचे हुए रखते हैं। कौन कब कैसे गायब हो जाए कुछ ठिकाना नहीं होता। शिक्षा और रोज़गार नदारद है और घर के मर्दों की बात को पत्थर की लकीर मान लिया जाता है, भले ही वो सही हो या फिर गलत।

मेरी आँखें बार बार मोली की आँखों से टकरा रही हैं और भाभी की कतराती आँखें याद आती जा रही हैं। शांत कमरे में मेरा मन चीख चीखकर पूछ रहा है, क्यों आज भी होलिका जल रही है? क्यों हिरण्यकश्यप आज भी समाज को पीड़ा पहुंचा रहा है? क्यों?

”अब बस बहुत हुआ। मैं मोली को बाज़ारों में बिकने नहीं दूंगी।”

खिड़की तोड़कर मैं मोली को लेकर बाहर निकल गई। मुझे याद है कि रात ग्यारह बजे आखरी बस जाती है दिल्ली के लिए और किसी भी तरह बस अड्डे पहुँचना ही है। पैसे नहीं थे, ना मेरे पास, ना गुल्लक में मगर एक उम्मीद थी और उसी उम्मीद के चलते मैं छुपती-छुपाती, जैसे-तैसे बस अड्डे पहुँची। बस की आखरी सीट पर मोली को बिठाया और नीचे उतर आई। बस की रवानगी के साथ मैंने एक लम्बी साँस भरी और मोली की सलामती की दुआ माँगी।

मैं जानती थी मेरा अंजाम क्या होना है और उस अंजाम को दिमाग़ में रख घर को लौट ही रही थी कि एक ज़ोरों का वार मेरे कान के नीचे पड़ा और मैं ज़मीन में गिर गई।

भैया थे, हाथ में डंडा लेकर।

“तू बाहर कैसे निकली?” और फिर एक डंडा मेरी टांगो में मारा। दर्द बढ़ गया और मेरे आँखों से आँसू आने लगे।

“मोली कहाँ है?” भैया ने पूछा।

मैं खड़ी हुई।

”वो चली गई, उसे मैंने आज़ाद कर दिया।” भैया की आँखें लाल और शरीर फूल सा गया था। भैया का यही रूप मैंने ठीक पाँच साल पहले देखा था।

होलिका की आग ज़ोर पकड़ चुकी थी और उसे जलाने वाले नाच-गा रहे थे, रंग लगा रहे थे। भैया ने मुझे बालों से पकड़ रखा था और भीड़ से दूर ले जाने की कोशिश कर रहे थे। मुझे पता था आज मैं बचूंगी नहीं।

होलिका की आग के पास से गुज़रते वक़्त मैं उनके हाथों से खुद को छुड़ा होलिका की जलती आग में कूद गई। होलिका के साथ मैं भी जलती रही और भीड़ मेरी मौत पर नाचती रही, रंगों से खेलती रही।

अचानक एक हादसा हुआ। होलिका के सिरहाने का हिस्सा टूट कर भीड़ पर गिर गया। कुछ लोगों की मौत हो गई और उस भीड़ में भैया भी थे। शायद आज विष्णु जी ने उस अर्धजले अंग का रूप लेकर हिरण्यकश्यप की शक्ति का गला घोंट दिया।

होलिका जलती है और बुराई पर अच्छाई की जीत का सन्देश देती है, मगर सच तो ये है कि आज भी ना जाने कितने घरों में रोज़ मुझ जैसी होलिका को जलना पड़ता है लेकिन हिरण्यकश्यप का वध नहीं होता। वक़्त बदल गया है और कहानियों का मतलब भी मगर चरित्र? चरित्र आज भी नहीं बदल पाया है।

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