स्वैग वाला प्यार । कल्लोल मुख़र्जी

 

वो कहते हैं ना, जब किसी चीज़ को शिद्दत से मांगो तो मिल ही जाती है; हमें भी छुट्टी मिल ही गयी दफ्तर से, वो भी पूरे दो हफ्ते की। बस इसी ख़ुशी में बैग पैक किया और जबलपुर आ गए हम।

यूँ तो जबलपुर देश के नक़्शे में बहुत छोटा है और शायद दिखता भी नहीं, और दिल्ली वाले तो अक्सर जबलपुर को कहीं दूर का कोई छोटा सा गाँव मानते हैं; अब उन लोगों की मानसिकता तो परिवर्तित नहीं कर सकते मगर हाँ, जानकारी के लिए बता दूँ देश की 6 आर्डिनेंस फैक्टरियाँ हैं यहाँ, जबलपुर को कुछ हुआ तो देश का डिफेन्स डगमगा जाएगा। खैर अब जबलपुर आ गए तो ध्यान आया सरदार जी के फ़ास्ट फ़ूड रेस्टोरेंट ‘बेस्ट चॉइस’ का। हमारे जैसे युवाओं का यह मीटिंग प्लेस है और शाम 7 के बाद तो कुर्सी मिलना भी मुश्किल है यहाँ। अक्सर दोस्तों के साथ जाया करते हैं मगर आज अकेले जाने का ठाना ताकि जेब भी ज़्यादा हल्की ना हो और 3 महीने की कसर भी उतर जाये। पहुँचते ही एक चिकन बर्गर, चिकन नगलेट्स और एक कोक आर्डर दे कर जगह खोजने लगा। देखा तो एक ही टेबल बची है और उसमें भी एक सीट में एक लड़की बैठी है। शायद मैं दिल्ली में नौकरी नहीं कर रहा होता तो उस कुर्सी तक नहीं जाता मगर अब दिल्ली के लौंडे का स्वैग चढ़ गया और खुद को ज़ंज़ीर का अमिताभ बच्चन समझ कर मेमसाहब के पास पहुंच गया।

“एक्सक्यूज़ मी! कैन आई सिट हेयर?”

“यस।”

“थैंक्यू।”

मैंने कुर्सी पीछे ली और बैठ गया, देखा मैडम हमारी तरफ प्रश्नचिन्ह सा चेहरा बनाकर देख रही हैं।

“व्हाट हैपेंड?”

“आपने पूछा भी नहीं और बैठ गए! यू शुड लर्न सम मैनर्स।”

मैंने सोचा कि यार पूछा तो था मैंने, फिर यह ऐसा क्यों बोल रही?

“जी मैंने ज़रूरत नहीं समझी। वो क्या है ना, ना तो यह कुर्सी आपकी है और ना ही यह दुकान।”

मैडम जी ने मुँह बनाया और अपना बर्गर खाने लगी और तब तक मेरा खाना आ गया। जैसे ही मेरा चिकन बर्गर टेबल में रखा गया मैडम ने अपना बर्गर ऐसे खींच लिया मानो केजरीवाल को मोदी की डिग्री थमा दी गयी हो।

खैर! हम भी दिल्ली के 3 महीने पुराने डूड हैं, कहां चुप रहने वाले थे।

“घबराइये मत। हमें एड्स नहीं है।”

“सॉरी..?”

“लगता है आपको कम सुनने की बीमारी है, मेरे पहचान के डॉक्टर हैं कहें तो बात करवा दूं। डिस्काउंट मिल जाएगा।”

“देखिये, मुझे सब सुनाई दिया मगर यह समझ नहीं आया कि बीच में एड्स कहाँ से आ गया?”

“आपने मेरा बर्गर देखकर अपना बर्गर ऐसे खींचा कि मुझे लगा कि मैं कहीं किसी बीमारी से ग्रस्त तो नहीं?”

“हा हा.. नहीं वो क्या है ना कि मैं वेज हूँ इसलिए और वैसे भी आपकी जानकारी के लिए बता दूँ एड्स छूने से नहीं फैलता, मेरी डॉक्टरी तो यही कहती है।”

“अच्छा तो और क्या कहती है आपकी डॉक्टरी? ”

“यह कि आपको मानसिक डॉक्टर के पास जाना चाहिये।”

“हाँ, अक्सर घास फूस खाने वालों को यही लगता है।”

“घास फूस?”

“यानी वेजिटेरियन। अब फूल पत्तों में वो बात कहाँ जो चिकन, फिश और एग्ग में है।”

“जी, मगर ऐसे जानवरों को मारना नहीं चाहिए। कभी खुद को उनकी जगह रखकर देखो, आखिर उनमें भी जान है।”

“हाँ, शायद बोस जी ने कहा था कि पेड़ पौधों में भी जान होती है।”

“लगता है काफी फ़ोकटिया हो। खैर खाओ अपना चिकन हमको बहुत काम है।”

यह कहकर वो उठी और जाने लगी। ऐसा लग रहा था मानो हवाई जहाज उड़ा तो लिया मगर अब लैंडिंग को जगह नहीं मिल रही थी। वो जा रही थी और मेरा दिल्ली का स्वैग मुझपर ज़ोर ज़ोर से हँसकर कह रहा था, “बेटा। बंदी के कम्फर्ट ज़ोन में घुसकर भी कुछ ना उखाड़ पाये।’’

खैर हमने चिकन को ज्यादा प्रायोरिटी देते हुए लड़की को जाने दिया। बर्गर खत्म कर बाहर निकलकर कुछ कदम आगे बढ़े ही थे कि मैडम जी से फिर से मुलाकात हो गयी। अपनी स्कूटी को लात मार रही थीं वो ।

“हेल्लो डॉक्टर मैडम। कुछ मदद तो नहीं चाहिए?”

शक्ल में ‘ना’ मगर दिल में ‘हाँ’ लिए उन्होंने कहा, “हाँ, अगर कुछ कर सको तो।”

“अरे कुछ नहीं, इन गाड़ियों में कार्बोरेटर की दिक्कत होती है, अभी ठीक कर देते हैं।”

“अच्छा, तो आप मैकेनिक हैं ?”

यह सवाल सुनकर ऐसा लगा मानो किसी ने दिल में छुरा घोंप दिया हो मगर मैंने कोई जवाब नहीं दिया और उनकी गाड़ी को टटोलने लगा। कुछ समय लगा मगर गाड़ी चालू हो गई।

“लो जी चालू हो गई आपकी गाड़ी, मैकेनिक नहीं मैकेनिकल इंजीनियर हैं। पिन से लेकर एयरोप्लेन तक हर चीज़ का ज्ञान है। सो नेवर मेस्स विथ एन इंजीनियर।”

“ओह! थैंक्स।”

यह कहकर वो स्कूटी में बैठी और चल दी। अब लग रहा था कि जो प्लेन को लैंडिंग की जगह नहीं मिल रही थी उसका अब फ्यूल भी ख़त्म हो रहा है। इस बात का अफ़सोस मन ही मन हो रहा था कि गाड़ी कुछ दूर जाकर रुक गई।

“ओह! फिर रुक गई।” उन्होंने खिजते हुए कहा।

अब उन्हें कैसे बताते कि आई.आई.टी के थोड़ी ना हैं। फर्जी डिग्री इतनी देर ही चलती है। मगर नाक भी तो नहीं कटानी थी।

“वो क्या है ना, औज़ार नहीं हैं, वर्ना फुल ठीक कर देते। एक काम करते हैं, मैकेनिक के पास ले चलते हैं। यहीं पास ही में है।”

वो मान गई और हम गाड़ी ढकेलते-ढकेलते पास में बने मैकेनिक शॉप तक ले गए।

“भैया देखो ज़रा क्या दिक्कत है?”

“सर, दुकान बंद करने का वक़्त हो गया है। आप गाड़ी रखवा दो कल सुबह तक दे दूंगा।”

“डॉक्टर मैडम, बताओ क्या करना है?”

“मैं क्या बताऊँ? कुछ समझ नहीं आ रहा।”

“भैया, जल्दी बताओ यार! घर जाना है, बीवी का कॉल आ रहा है बार बार।” मैकेनिक ने कहा।

“अरे हाँ ना भैया दो मिनट।”

“डॉक्टर मैडम ऐसा करते हैं, गाड़ी रखवा दो भैया का नंबर ले लो और अभी ओला कर घर चले जाओ। ”

“गुड आईडिया!”

“देखा कहा ही था नॉन वेज खाने से प्रेसेंस ऑफ़ माइंड बढ़ता है।”

“चुप रहो अच्छा।”

मैंने ओला बुक कर दी और मैडम उसमें बैठ घर को चली गईं। दिल पे पत्थर रख मैं भी घर वापस आने लगा। 3 महीने पुराना दिल्लीवासी होने पर शर्म आ रहा थी अब। ऐसा लग रहा था जैसे मेरे हवाई जहाज को ईंधन भी मिला और लैंडिंग के लिए जगह भी, मगर पायलट ही नौसिखिया निकला। यह सब सोचते सोचते घर आया और इस हादसे को भूलने की कोशिश करने लगा। इन बातों को भुलाने के लिए व्हाट्सएप्प खोला तो देखा एक मैसेज था।

“थैंक्यू इंजीनियर साहब, गॉट योर नंबर फ्रॉम ओला ड्राईवर।”

मुझे मेरी तकदीर पर भरोसा नहीं हो रहा था। मन कर रहा था कि ओला के सपोर्ट में कॉल कर धन्यवाद प्रकट करूँ, मगर मैंने अपने एक्साइटमेंट को रोका और बस इतना ही लिखा,

“वेलकम डॉक्टर मैडम”।

वो नौसिखिया पायलट स्क्रीन पर typing… देख कर ही हवा में पहुंच गया था।

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