मेट्रो का प्रेमचंद । कल्लोल मुख़र्जी

 

आज ऑफिस से लेट हो गया। घड़ी में 8:35 हो रहे थे। आॅफिसों की भीड़ अपने घर जा चुकी थी। मेट्रो की रफ़्तार भी अब कुछ बढ़ रही थी। पर आज शायद मेट्रो को मुझसे या मुझे मेट्रो से कुछ ज्यादा ही प्यार हो आया था जो भागते भागते मैं मेट्रो में चढ़ ही गया।

मेट्रो का माहौल कुछ अनजाना सा लग रहा था, आखिर मेट्रो में इतनी शांति और इतना कम भीड़ देखने की आदत जो नहीं थी। खैर, मेट्रो का दरवाज़ा बंद हुआ और मैं सीट तलाश करने लगा। हालांकि कीर्ति नगर से सीट मिलने की उम्मीद करना राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने जैसा है, कितनी भी कोशिश कर लो मगर नहीं मिलने वाली, पर फिर भी नज़र दोहराने में क्या हर्ज़ है।

आँखों की पुतलियाँ घुमाईं तो सीट तो नहीं, मगर एक हुस्न की परी नज़र आई। मेट्रो की महिला सीट की कुर्सी में हाथो में उपन्यास लिए अपने ज़ुल्फ़ों को उपन्यास के पन्नो में झुलाती ना जाने किस दुनिया में खोई थी। मैं उसके सामने खड़े हो हैण्ड हेंगर से झूलकर उसकी ख़ूबसूरती को निहारने लगा। सुना था पहली नज़र में भी प्यार होता है शायद अब मुझे प्यार की अनुभूति हो रही थी।

मेरी आँखे उसकी सुंदरता निहारने में इतनी लीन हो गईं थी कि चाहते हुए भी मै अपनी पुतलियाँ भटका नहीं पा रहा था। तभी बाजू में बैठे बुज़ुर्ग उठे और दरवाज़े की तरफ चल दिए और मै चीते की रफ़्तार से उस के बगल वाली सीट में जाकर बैठ गया। गौर किया तो देखा कि वो डान ब्राउन की ‘द लॉस्ट सिंबल’ पढ़ रही थी, किताब पढ़ती और मंद मंद हँसती; उसकी इस अदा में मैं इतना खो गया कि पता भी नहीं चला कि कब मेरा स्टेशन निकल गया।

अब निश्चय कर लिया मैंने कि आज बात करके ही रहूँगा। अपने बस्ते से मैंने भी प्रेमचन्द की गोदान निकली और बीच में से पढ़ने लगा। वो मेरी किताब की तरफ देख, फिर अपनी किताब पढ़ने लगी। उपन्यास पढ़ने का कोई इरादा नहीं था मेरा और वैसे भी गोदान तो कई दफ़ा पढ़ चुका था मगर उससे बात करने के लिए कुछ तो करना ही था।

“आपने गोदान पढ़ी है?”

”नहीं!”

“ओह! पढ़ियेगा। बहुत उम्दा है।”

“जी।”

अरे यह क्या यह तो एक शब्द में उत्तर दे रही है, अब बात करने के लिए कुछ अलग करना पढ़ेगा।

“अच्छा, डान ब्राउन कैसा लिखते हैं?”

“अच्छा लिखते हैं।”

“आपने सारी उपन्यास पढ़ी हैं क्या?”

“नहीं, यह मेरी दूसरी है।”

चलो एक शब्द उत्तर से कुछ तो बात आगे बढ़ी।

“अंग्रेज़ी साहित्य का चलन आजकल बहुत बढ़ गया है ना, मतलब आपको नहीं लगता हमे हिंदी भी पढ़ना चाहिए?”

“जी बात तो ठीक है मगर हिंदी साहित्य में वैरायटी नहीं है।”

“अच्छा! क्या पता? बिना पढ़े हमें किसी भी भाषा के साहित्य पर उंगली नहीं उठानी चाहिए।”

“आप गलत समझ रहे हैं। मैं उंगली नहीं उठा रही, बस बता रही हूँ। आप पढ़कर देखना कभी डान ब्राउन, अच्छा लगेगा आपको।”

“जी ज़रूर। वैसे आप यह प्रेमचंद रख लीजिये, जब आपका डान ब्राउन ख़त्म हो जाये तब पढ़ लीजियेगा, अच्छा लगेगा आपको।”

“नहीं नहीं ठीक है, आप पढ़िए। मैं खरीद लूँगी।”

“मैं कई दफ़े पढ़ चुका हूँ गोदान, आप रख लीजिये। किसी अजनबी का हिंदी भाषा का तोहफ़ा मान लीजियेगा।”

“तो फिर एक तोहफ़ा मेरी तरफ से भी होना चाहिए।” उसने मुस्कुराते हुए कहा।

“क्या?”

“अंग्रेज़ी भाषा का तोहफ़ा, डान ब्राउन, ‘द लास्ट सिंबल’। बस ख़त्म ही होने वाली है फिर आप ले लीजियेगा। पढ़िएगा।”

कुछ ही देर में द्वारका आ गया। शायद इस कम्बख़त मेट्रो को भी हमारी नज़दीकियों पर जलन होने लगी थी, वर्ना सेक्टर 21 तक तो जाती वो। फिर हमनें अपनी किताबें बदल लीं।

“ओह! आई फॉरगॉट टू आस्क योर नेम?”

“कल्लोल.. कल्लोल मुख़र्जी।”

“सुलेखा बौमिक.. इट वास् नाइस टू मीट यू।”

फिर एक प्यारी सी हंसी और वो अपने रस्ते चली गई। उस दिन के बाद सुलेखा को फेसबुक, ट्वीटर, इंस्टा कहाँ कहाँ नहीं ढूंढा मगर नहीं मिली। उसकी एक नज़र के लिए कई बार उसी वक़्त की मेट्रो और वही दो नंबर वाली बोगी में सवारी की मगर वो नहीं मिली। कितने रविवार द्वारका के चक्कर लगाये मगर वो नहीं मिली, फिर मैंने मुलाकात किस्मत के हाथों छोड़ दी।

आज उस मुलाकात को हुए करीब आधा साल बीत गया, आज भी ऑफिस से लेट छूटा और भागकर मेट्रो में चढ़ा, वही कुर्सी की तलाश की और वही चिर परिचित चेहरा नज़र आया। मन किया भागकर जाऊं और बात करूँ मगर उसके कंधे के ऊपर रखे उस हाथ ने मेरे कदमों को रोक लिया। अपने पुरुष मित्र के साथ काफी खुश नज़र आ रही थी। मैंने कदमों को पीछे लिया और भीड़ में छुप गया, और छुपकर उसे देखने लगा। गौर किया तो आज भी उसके हाथों में एक उपन्यास है मगर इस बार डान ब्राउन नहीं, प्रेमचंद!

 

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