बरसात- आज और कल । कल्लोल मुख़र्जी

“कहाँ हो आप?”

“रास्ते में।”

“भीग गए हो क्या?”

“हाँ, पूरा।”

“कहा था ना, छाता ले जाओ! मेरी बात तो सुननी ही नहीं है घर में किसी को! अब सारी रात खाँसना और किसी को सोने मत देना।”

“अब क्या फायदा? गीला तो हो ही गया हूँ। घर आकर बात करता हूँ।”

कुछ ही देर में दरवाज़े की घंटी बजी, रुतापा जल्दी से हाथ में छाता लिए घर के बाहर बने आँगन के गेट को खोलने भागी।

“मेरी तो सुननी ही नहीं है किसी को! भीग गए हो, साथ-साथ डॉक्टर को भी दिखा आते। चलो अब।”

“रुतापा, आज मुझे भीग जाने दो। इस बरसात में खो जाने दो, इस मिट्टी की सौंधी खुशबू से तृप्त हो जाने दो।”

“ओ मेरे देवानंद! चलो चुपचाप घर वर्ना बिस्तर में ही तृप्त होना पड़ेगा।”

यह कहकर रुतापा अपने हाथ से छाता उनके सिर के ऊपर लेकर, पीछे मुड़कर चलने ही वाली थी कि तभी उन्होंने उसका हाथ पकड़ा और पास आकर, आँखों में आँखे डालकर कहा,

“17 जुलाई 1968, शाम 6:30 बजे, एक खूबसूरत सी लड़की बाज़ार से घर को जा रही थी, ठीक इसी तरह का मौसम था, ऋतु की पहली बरसात हो रही थी। कुछ याद है तुम्हें?”

“हाँ, तभी एक पागल लड़का साईकल से आकर मुझसे भिड़ गया। वो लड़का, लड़की के स्कूल का मित्र था और ना जाने इस बारिश में क्यों मेरा रास्ता रोक कर, मेरे छाते के अंदर आकर खड़ा हो गया था।”

“रुतापा, वो प्यार करता होगा ना लड़की से। उसके हाथ में गुलाब भी तो था।”

“गुलाब का नहीं पता मगर वो पागल उस मूसलाधार बारिश में अचानक अजीब से बहाने करने लगा। बैग से उसने पकोड़े और पुदीने की चटनी निकाली और वहीं उस हालत में खिलाने लगा।”

“हाँ, तो? लड़की को पसंद था तभी तो खिला रहा था।”

“पसंद है तो इसका मतलब कभी भी, कहीं भी, किसी भी हालात में खा लेगी क्या?”

“अच्छा! तो फिर क्यों खाए उस लड़की ने पकोड़े?”

“अरे बाबा! प्यार करती होगी ना।”

“ओह! मुमकिन है।”

“मगर वो गुलाब, वो तो नहीं मिला लड़की को। पक्का लड़के ने किसी और को दे दिया होगा।”

“नहीं जी! यह देवानंद इस ज़माने का देवानंद थोड़े ही है, जो साथ में एक बैकअप प्लान लेकर चले। प्यार तो उस लड़की से ही था मगर गुलाब देने की हिम्मत नहीं हुई उसकी।”

“लगता है यह देवानंद सिर्फ अपनी ही फिल्में देखते थे, तभी उन्होंने मधुबाला का वो गाना नहीं सुना- जब प्यार किया तो डरना क्या?”

“अच्छा! यह बात है? रुको।”

इतना कहकर वो थोड़ा पीछे हटे, कुर्ते की जेब से एक लाल गुलाब निकाला और घुटने के बल बैठ गए।

“सुनो! आई लव यू रुतापा। आई कैन डाई फॉर यू।”

यह सुनकर रुतापा शर्मा गई और उनके हाथों से गुलाब लेकर उनकेे गले लग गई।

“आई लव यू टू, मुरारी।”

कभी-कभी कुछ बातें, कुछ भूली धूल जमी यादें, कैसे अचानक याद आ जाती हैं। कमाल है! कैसे बारिश और माटी की खुशबू ने दोनों वृद्धों की 48 साल पुरानी मोहोब्बत को फिर से जीवित कर दिया। ज़िन्दगी का पहिया तो ज़िम्मेदारियों, ज़रूरतों, मुद्रा इत्यादि के बोझ के तले इतनी दूर भाग गया कि कभी उस पर प्यार का ब्रेक तक नहीं लगा। प्यार तो था मगर जताने का वक़्त कहाँ था।

तभी पीछे से किसी के छींकने की आवाज़ आई और दोनों वृद्ध जल्दी से एक दूसरे का कन्धा छोड़ पीछे देखने लगे, तो देखा कि उनका बेटा खड़ा है। वैसे, वो भी वहां पिछले दस मिनट से खड़ा था मगर इस मिलाप को रोकना उसने मुनासिब नहीं समझा।

“अरे बेटा, दफ्तर से आ गए? हम तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहे थे।”

बारिश में भीगी रुतापा ने हिचकिचाते हुए कहा और कहकर रुतापा और मुरारी दरवाज़े की तरफ चल दिए।

“सुनो, मूव रखा है ना? घुटने में दर्द हो रहा है।” मुरारी ने कहा।

“सब है, अभी अंदर चलो। हड्डियों में जब जान ना हो, तो होशियारी नहीं करनी चाहिए। बता दीजियेगा उस लड़के को।”

यह कहकर रुतापा मुस्कुराई और दोनों अंदर चले गए।

 

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