अब आ भी जाओ । कल्लोल मुख़र्जी

 

“हैलो। सुनाई दे रहा है तुम्हें प्रियाषा?”

“हाँ! सुन पा रही हूँ तुम्हें।“

“कैसी हो तुम?”

“ठीक हूँ। तुम कैसे हो प्रीतम?”

“मैं बहुत अच्छा हूँ। कब आओगी तुम वापस? रोज़ कहती हो अब लौटोगी-तब लौटोगी, मगर फिर लौट ही नहीं रही हो।“

“नहीं प्रीतम, अब लौट आऊंगी तुम्हारे पास।”

“अच्छा। पता है प्रियाषा, हमारा कोलकता कितना बदल गया है?”

“कितना बदला है?”

“बहुत। हद से ज़्यादा। पहले जब सीआदह से विक्टोरिया के लिए ट्राम में पैर रखने की जगह नहीं मिलती थी, अब वही ट्राम ख़ाली- ख़ाली चलती हैं।“

“क्यों? पीली गाड़ियों की संख्या बढ़ गई है क्या कोलकाता में?”

“नहीं नहीं। पीली गाड़ी कहाँ अब ट्राम को टक्कर देगी? दरअसल हुआ यह है कि लोगों की ज़िन्दगी की रफ़्तार बढ़ गई है। अब तो सुना है मैट्रो रेल की नई पटरियां भी बिछ रही हैं।“

“हाँ तो अच्छा है ना। तकनीक की सड़क पर कब तक पुरानी गाड़ी चलती रहेगी? हर चीज़ बदलती है। बदलाव का साथ नहीं दोगे तो कैसे ज़िन्दगी चलेगी और बदलेगी?”

“हाँ, जिस तरह तुम भी बदल गई और इतनी बदली कि अब मेरे पास आने का नाम तक नहीं ले रही।“

“उफ़्फ़! कहा ना, अब बहुत जल्द ही आ जाऊंगी तुम्हारे पास।”

“अच्छा ठीक है, ठीक है। चिढ़ क्यों रही हो? तुम्हें पता है, उत्पल अब कुर्ता नहीं शर्ट पहनता है और लक्ष्मी भी ससुराल से कम आती है।“

“तुम कितने रूढ़िवादी हो। समझ नहीं आता, वक़्त बदल गया है? उत्पल शर्ट इसलिए पहनता होगा क्योंकि दफ़्तर में कुर्ता मंज़ूर नहीं करते और लक्ष्मी को पति और बच्चे नहीं सँभालने क्या?”

“हाँ, शायद तुम ठीक कहती हो। अच्छा, तुमने वो बिना तार वाला फ़ोन देखा है?”

“हा! हा! अरे मूरख, उसे मोबाइल कहते हैं।”

“अरे जो भी कहते हैं उसे, देखा है तुमने?”

“हाँ, देखा है ना।”

“उत्पल ने भी एक खरीदा है। मगर सच कहूँ, तुमसे बात करने का मज़ा तो इस टेलीफ़ोन में ही आता है।”

“हाँ, आएगा क्यों नहीं, इसी टेलीफोन से ही तो तुमने ग़लत नंबर लगाकर मुझे मोहन बागन और ईस्ट बंगाल के फुटबॉल मैच का न्यौता दे दिया था।“

“हा! हा! तुम्हें अब भी याद है?”

“कैसे भूल सकती हूँ? इतनी जल्दबाज़ी में थे तुम कि सामने कौन है, ख़्याल तक नहीं किया।“

“हाँ, मेरी गलती थी। पर तुम भी तो मैदान आ गई थीं।“

“हाँ, तो डर्बी कोई छोड़ता है क्या? वो भी मुफ़्त में देखने को मिल जाए।”

“हा! हा! तुम्हारे इस फुटबॉल प्रेम ने ही तो मेरा दिल चुरा लिया।”

“हाँ, जैसे मोहन बागन ने ईस्ट बंगाल से जीत चुराई थी।“

“उफ़्फ़! अब तो ईस्ट बंगाल के हारने का ताना देना बंद करो।“

“अच्छा जी! आप नहीं बदलेंगे और हम बदल जाएँ?”

“प्रियाषा, अब आ जाओ ना। अकेले-अकेले ट्राम में सफ़र करथक सा गया हूँ। अच्छा प्रियाषा सुनो, अभी रखता हूँ। शायद उत्पल घर आ गया है।”

“पिताजी! आप किससे बात कर रहे थे? अरे, ये क्या, आपने फिर कचरे से इस पुराने फ़ोन को निकाला? कितनी बार समझाना पड़ेगा, इससे अब फ़ोन नहीं लगता। और रही बात माँ की, तो कब तक ऐसे ही ख़ुद को झूठा दिलासा देते रहेंगे?”

1971, भारत-पाकिस्तान युद्ध में हज़ारों रिश्तों के टुकड़े हुए थे। और शायद उन रिश्तों में से एक रिश्ता प्रीतम और प्रियाषा का भी था। बांग्लादेश तो आज़ाद हुआ, मगर ना जाने कितने प्यार करने वालों को जुदा कर गया।

प्रीतम आज भी दिल को दिलासा देने के लिए, छुपकर प्रियाषा को फ़ोन घुमाकर उसे जीवित रखता है। मगर प्रियाषा कहाँ है? किस हालत में है? किसी को इसका कोई पता नहीं। युद्ध कुछ हद तक दो देशों के राजनैतिक मामलों को भले ही सुलझा देता है, मगर उन दो देशों में रहने वाले हज़ारों लोगों को अपनों से ही जुदा कर देता है।

 

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