यादों का सफ़र । कल्लोल मुख़र्जी

 

“मेट्रो या ऑटो?”

“ऑटो।”

“वैसे मेट्रो में भी जा सकते हैं, अभी रात के 11 ही बजे हैं। भीड़ भी नहीं होगी और एअरपोर्ट एक्सप्रेस वे से 30 मिनट में एअरपोर्ट पहुँच भी जायँगे।”

“नहीं, ऑटो!” उसने बात को कोई तूल ना देते हुए कहा।

“ज़िद्दी.. तुम बिलकुल नहीं बदली।”

पूरे आठ साल बाद मिले थे। एम.बी.ए साथ में करने के बाद एक ही कंपनी में काम करना जैसे सोने पर सुहागा था। मगर उसको कंपनी के लंदन वाले ऑफिस में भेज दिया गया। आज किसी काम से दिल्ली आई तो ऑफिस में ही मुलाकात हुई। शारीरिक गठन में कुछ ख़ास बदलाव नहीं हुआ था। वही आँखों में काजल, गुलाबी गालों में पड़ते गड्ढे और कपड़ों में वही सादगी। लग ही नहीं रहा था कि इतने सालों बाद आई है।

ऑफिस में मीटिंग के बाद हमने ऑफिस के बाहर लल्लन चाय वाले से चाय पी। हाँ! चाय के दाम भले ही बढ़ गए थे मगर स्वाद वही बरकरार था। लल्लन की दुकान में सिगरेट और चाय की चुस्की लेते हुए शिल्पी ने बताया कि आज ही उसे लंदन वापस लौटना है तो मैं थोड़ा निराश हो गया। 8 साल के लंबे फ़ासले को सिर्फ एक घंटे में मिटाना काफी नहीं था तो मैंने यह ऐलान कर दिया कि उसे एअरपोर्ट छोड़ने मैं साथ चलूँगा।

कुछ देर सड़क पर मंडराने और इधर उधर झाँकने के बाद एक ऑटो मिला। मैंने तो कैब करने का भी प्रस्ताव दिया था मगर शिल्पी को तो ऑटो ही चाहिए था। कहना था कैब में तो बहुत घूम लिया मगर जो मज़ा ऑटो में है वो कैब में नहीं।

खैर, लड़कियों की मानसिकता तो आज तक बड़े-बड़े वैज्ञानिक नहीं समझ पाए हैं, हम तो फिर भी प्राइवेट नौकर हैं। ज्यादा सोच विचार ना करते हुए कुछ देर ढूंढने के बाद एक ऑटो मिल गया और हम उसपर सवार हो गए।

“भैया, मीटर से चलना।” शिल्पी ने ऑटोवाले को हुक्म देते हुए कहा।

“मैडम, रात का वक़्त है, एक्स्ट्रा चार्ज लगेगा। चलना है तो चलो।”

दिल्ली में कोई किसी का सगा नहीं होता, इतने सालों में ये बात तो अच्छे से जान ही चुका था मैं। ऑटोवाला हमारी मजबूरी का फायदा उठाना चाहता था और शिल्पी तो थी ही ज़िद्दी। कुछ देर तक दोनों के बीच युद्ध ना रुकने की स्थिति देख मैं समय और ऊर्जा की बचत के लिए बोल पड़ा,

“ठीक है भैया, मीटर से 100 ऊपर ले लेना।”

“नहीं 200।”

“ठीक। अब चलो।”

इतना कहकर मैं और शिल्पी ऑटो मैं बैठ गए। शिल्पी युद्ध हार गई थी तो मुँह फेर कर बैठी हुई थी और मन ही मन बड़बड़ा रही थी।

“ठीक है यार शिल्पी। क्यों रूठ रही हो? 200 रुपये ही तो है।”

“नहीं.. तुम शांत रहो और ऑटो का पर्दा डाल दो।”

“क्यों?”

“मेरी प्राइवेसी है, तुम डालो।”

जब महिलाओं की चलती है तो कोई उन्हें रोक नहीं सकता। मैंने अपनी तरफ का पर्दा डाला और देखा ऑटोवाला अपना बैक व्यू मिरर ठीक कर रहा था मानो वो किसी अंतरंग दृश्य देखने की कामना कर रहा हो।

“अब खुश?” मैंने ऑटो के अंदर सारे पर्दे लगा, सामान को ठीक से जमाकर पूछा।

मगर बदले में कोई जवाब नहीं मिला। साफ़ था कि वो ऑटोवाले से युद्ध हारकर निराश थी। उसका यह रूप पहले नहीं देखा था। शायद 8 सालों को यह नया बदलाव आ गया था उसमें।

ऑटो एअरपोर्ट की तरफ अग्रसर था और मैं बीती ज़िन्दगी की यादों में ऑटो से भी ज़्यादा तेज़ रफ़्तार से पीछे जा रहा था। मेरे और शिल्पी के बीच क्या कुछ बदला है और क्या कुछ नहीं, यही सब ध्यान आ रहा था। इससे पहले जब भी हम मिले थे तो हमारे ज़ुबां की गुफ़्तगू कभी रुकी नहीं थी। हम अपने में इतना खो जाया करते थे कि अगल बगल की आवाज़ सुनाई नहीं देती थी या यूँ कहें कि सुनने की कोई इच्छा ही नहीं हुआ करती थी। मगर आज मानो ऑटो के पहियों का सड़क के साथ का वार्तालाप भी सुनाई दे रहा था।

वक़्त कितना कुछ बदल देता है।

“वैसे तुम्हारी प्राइवेसी को यह सलमान खान और ऐश्वर्या राय के पोस्टर भंग नहीं कर रहे?” हमेशा की तरह माहौल को ठंडा करने के लिए मैंने एक पी.जे मारा, मगर इसका भी उसपर कोई फर्क नहीं पड़ा।

ना जाने ऐसी क्या बात हो गई थी जिसके कारण वो इतनी नाराज़ थी।

फिर कुछ देर की शांति।

सुनसान खाली सड़क पर जितनी तेज़ रफ़्तार से ऑटो एअरपोर्ट की ओर भाग रहा था, उतनी ही स्थिरता और निस्तब्धता ऑटो के भीतर हमारे बीच थी।

“सुनो शिल्पी, यू नो आई लव्ड यू।” अचानक मेरे मुँह से यह वाक्य निकल पड़ा। कभी कभी शब्द कैसे कब और कहाँ अपने आप किसी बाण की तरह बिना सोचे समझे निकल जाते हैं, समझ नहीं आता।

इतना सुनते ही वो मेरी तरफ झट से देख पड़ी जैसे कुछ गलत कह दिया हो।

“तो फिर कभी बताया क्यों नहीं तुमने?” आँखों में आँखें डाल उसने मुझसे पूछा।

“वो.. कभी.. कभी हिम्मत ही नहीं हुई।” ज़बान फिसल चुकी थी तो सच बोलना पड़ गया।

“क्यों हिम्मत नहीं हुई?” फिर से उसने एक सावल पूछ लिया।

“रिजेक्शन का डर शिल्पी, रिजेक्शन का डर। मैं डरता था कहीं मेरे इन तीन शब्दों से हमारे बीच की इतनी अच्छी दोस्ती ना टूट जाए।”

“कितना अजीब है ना? कभी कभी तीन शब्द ही बहुत कुछ बदल देते हैं और कभी कभी पूरा का पूरा शब्दों का भण्डार कुछ नहीं बदल पाता। वैसे कितना प्यार करते थे तुम मुझसे? ” शिल्पी ने जवाब के साथ एक सवाल बांधते हुए अपने शब्द समाप्त किये।

“बहुत, बहुत ज़्यादा, हद से कहीं ज़्यादा। तुम्हें अंदाजा भी नहीं होगा कितना।” मैंने तुरंत जवाब देते हुए कहा।

“हाँ, तभी तुमने रेनू से शादी कर ली।” आँखें चुराते हुए उसने मुझसे कहा।

उसके इस सवाल ने मुझे शर्म से नंगा कर दिया। इस सर्द मौसम में मेरा बदन पसीने से लबालब गीला हो गया था। इतना तनाव मैंने आजतक कभी महसूस नहीं किया था।

“तुमने कभी प्यार किया मुझसे?” कुछ देर की शांति के बाद मैंने फिर पूछा।

“हाँ? नहीं.. कभी नहीं!” उसने आँखें चुराते हुए मुझे जवाब दिया।

उसका जवाब सुनने के बाद मेरे अंदर दोबारा हिम्मत नहीं हुई कि कुछ पूछूँ और उसने भी आगे कोई बात नहीं की। कुछ वक़्त की शांति के बाद हम एअरपोर्ट पहुँच गए। उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी मानो मेरे दिल पर चोट पहुँचाकर उसे उस ऑटोवाले का बदला मिल गया था। मैं उसका सामान निकाल विज़िटर्स एरिया तक ले गया और इतने में उसके फ्लाइट का अनाउंसमेंट भी हो गया।

“सुनो, चलती हूँ। अपना ख्याल रखना। और हाँ! यह चाबी रखो। मैंने अपना फ्लैट बेच दिया है और जिसे बेचा है उसे तुम्हारा नंबर दे दिया है। तो तुम उसे चाबी दे देना और थोड़ी साफ़ सफाई भी करवा देना, हो सके तो।”

“क्यों? तुम आओगी तो कहाँ..”

“नहीं.. नहीं आऊँगी। मैंने वहां की सिटीजनशिप के लिए अप्लाई कर दिया है।”

उसके इस जवाब को काटने के लिए मेरे पास कोई सवाल नहीं था। रोकना चाहता था मैं उसे मगर किस हक से रोकता?

“अच्छा चलो बाय चलती हूँ।”

उसके इस आख़िरी बाय का जवाब भी मैं बस हाथ हिलाकर ही दे पाया।

“अरे.. कितना बदल गये हो तुम? शादी हो गई तो क्या गले भी नहीं मिल सकती?”

चेहरे पर ख़ुशी के झूठे भाव लिए मैं उससे गले लग गया।

“आई विल मिस यू, बी इन टच।”
मैंने दुबककर उसे उसी मुद्रा में रहकर कहा मगर फिर कोई जवाब नहीं मिला। उसका यह सवालों के जवाब ना देने वाला बदलाव मुझे चिड़चिड़ा बना रहा था। और फिर वो चली गई। इस देश, मुझे, और साथ बिताए उन यादों को पीछे छोड़ वो चली गई। और मैं वहीं उसके पीछे मुड़कर देखने और “आई विल मिस यू टू” कहने का इंतज़ार करता रह गया।

अगले दिन मैं सफ़ाई कर्मचारी को लेकर उसके घर पहुँचा और सफ़ाई करवाने लगा। तीन में से दो कमरे तो चाबी से खुल गए मगर एक की चाबी नहीं मिली। मैंने ढूँढा तो चाभी वहीं थोड़ी दूर रखे मेज़ पर पड़ी हुई थी। अंदर दाखिल हुआ और बत्ती जलाई तो देखा दीवारों पर ढेर सारी तस्वीरें चिपकी हैं और इन तस्वीरों में सिर्फ एक चीज़ कॉमन है, मेरा चेहरा। साथ में बिताये हर पल, हर लम्हे की फ़ोटो उस दीवार में मौजूद थी। उसके जन्मदिन में दिया मेरा हर तोहफ़ा वहीं एक टेबल में पड़ा था।

मुझे कुछ समझ नहीं आया और मैं कमरे को अंदर से बंद कर पास में पड़ी चेयर पर बैठ गया। शायद उन तीन शब्दों का डर शिल्पी को भी था। शिल्पी भी प्यार करती थी मुझसे मगर कभी ज़ाहिर नहीं किया। शिल्पी के बदलाव पर ऊँगली उठाने वाला मैं खुद कब बदल गया, कभी पता ही नहीं चला। मैं उसे समझने चला था मगर क्या मैं कभी खुद को भी ढंग से समझ पाया? मैंने तुरन्त अपना फोन उठाया और उसका नंबर डायल किया मगर सामने से आवाज़ आई कि “द नंबर यू आर डायलिंग डज़ नॉट एक्सीस्ट।” शिल्पी अपनी यादों को बेचकर मुझसे दूर चली गई थी और इसका दोषी शायद मैं ही था। शिल्पी मेरे इंतज़ार में थककर अब आगे निकल गई थी और अकेला छोड़ गयी थी मुझे, ऐसे सवालों के साथ जिनके जवाब आज तक नहीं मिले, और शायद ना मिलेंगे।

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