*दहशत* | कल्लोल मुखर्जी

 

आज कर्फ्यू का पाँचवा दिन है। पिछले चार दिनों में बहुत हिंसा, मार-काट, पथराव, बलात्कार इत्यादि हुए हैं। यह सब तो अब हमारे और इस राज्य के लिए आम बात हो गई है। हिंसा की शुरुआत कब हुई किसी को नहीं पता, शायद तब ही हो गई थी जब राजा हरी सिंह ने अपने साम्राज्य को भारत में मिलाने का फैसला किया था, मगर हाल फ़िलहाल,भड़के माहौल की शुरुआत, नमाज़ के वक़्त हिंदुओं के पथराव करने से हुई। उनका कहना था कि ये नमाज़ की आयातों में लिपटे लोग ISIS से ताल्लुक रखते हैं। फिर मुसलमानों ने भी जवाब में कटा हुआ मांस का टुकड़ा मंदिर में फेंक दिया। उसके बाद हालात गंभीर, बेहद गंभीर हो गए। हिन्दू, मुसलमानों के प्राण के भूखे, तो मुस्लमान हिन्दुओं के प्राणों के भूखे।

यहाँ कश्मीर में मुसलमान, और मुसलमान होते जा रहे हैं, तो हिन्दू, और हिन्दू , और धर्म और दहशत में कैद हम दोनों ही धर्मों के लोग एक चीज़ तो भूल ही चुके हैं और वो है इंसानियत।

पिछले चार दिन से घर में बैठे-बैठे बस यही सोच रहा हूँ कि यह उग्रवादी पहचानते कैसे हैं कि कौन मुसलमान है और कौन हिन्दू? खून का रंग तो दोनों का ही लाल होता है, तो फिर कैसे? शायद धर्म तो बस एक बहाना है, यह लोग तो बस खून के भूखे हैं वर्ना दंगों और मार पीट के वक़्त क्या एक दूसरे का धर्म पूछकर हाथ, पत्थर चलाया जाता है?

“सुनो, मेरा पेट ज़ोरों से दर्द कर रहा है!”

अन्दर कमरे से सुमेली की आवाज़ आई। भागकर अन्दर जाकर देखा वो पेट पकड़कर बिस्तर पर लेटी हुई है और दर्द से करहा रही है। इस दर्द के पीछे का कारण, नौ महीने से पल रहे उसके पेट में वो बच्चा था जिसका अब इस बारूद की बस्ती में पैर रखने का वक़्त हो चला था। बाहर के माहौल और लोगों में लगी खून की भूख ने चार दिन से दरवाज़े से बाहर अनाज लेने के लिए भी जाने नहीं दिया था, मगर आज समस्या बहुत गंभीर थी। सुमेली को बच्चा होना था और बाहर कर्फ्यू का सन्नाटा पसरा हुआ था।

मुसलसल सुमेली की आवाज़ में दर्द घुल रहा था और यहाँ मेरा शरीर ठंडा पढ़ रहा था। एक अजीब सी कपकपी थी कि अस्पताल जाऊँ कि नहीं, घर से बहार सुमेली को लेकर निकलूँ कि नहीं? सुमेली की एक असहनीय आह ने मेरा भ्रम तोड़ा और बिना कुछ सोचे-समझे मैंने अस्पताल जाने का फैसला कर लिया।

जल्दी से पीछे के दरवाज़े से मैंने ऑटो निकाला, जिसने हफ्ते भर पहले से सवारी बैठाना बंद कर दिया था, उस् में सुमेली को बिठाया, ऑटो से अपने हिंदू होने के सारे सबूत मिटाए और फिर धीरे से ऑटो सड़क पर निकाल लिया।

अस्पताल करीब बीस मिनट की दूरी पर था, मगर यह बीस मिनट की दूरी तय करना मानो जंगली शेरों से भरे जंगल से बाहर निकलना था। सेना के फौजी कभी भी गोलियों से हमें भून सकते थे या फिर कोई मुसलमान हमें बीच सड़क पर रोक कर अपने खून की प्यास बुझा सकता था। ऐसे मौके पर मैं इन दोनों गुटों के लोगों को ना देखने और छिपकर अस्पताल पहुँच जाने की कामना कर रहा था।

सड़कों पर रेंग रहे इन पहियों को भी शायद मौत का डर सता रहा था, मगर सुमेली की तड़प उन्हें विराम लगाने से रोक रही थी। चप्पे-चप्पे पर खून की नदियों और बारूद की महक से पार पाते हुए हम अस्पताल पहुँच गए। अब अस्पताल पहुँचाने का श्रेय सेना को दूँ या सरकार को? या फिर तकदीर को?

घाटी का एक मात्र अस्पताल आज किसी शमशान सा शांत था। जहाँ मरीज़ों की भीड़ हुआ करती थी, आज भी वहाँ भीड़ है मगर दहशत की कुछ चीखों की। काश कभी टेलीविज़न वाले यहाँ आकर यहाँ का असली हाल लोगों तक पहुँचाते। ए.सी कमरों में वाद विवाद कर अगर इस मिट्टी का मसला सुलझ जाता तो आज सिर्फ लोग इन सूट-बूट पहने संवादाताओं को अपना मसीहा मान लेते।

अस्पताल पहुँचते ही मैंने कुछ ना देख समझकर सुमेली को पहियों वाले बिस्तर पर लिटाया और एक महफूज़ कमरे में बंद कर डॉक्टर अमर को ढूंढने लगा। लम्बी कद काठी, और चिकने चेहरे के डॉक्टर अमर को यहाँ घाटी में हिंदुओं का भगवान माना जाता है। हर तकलीफ़, हर बीमारी का इलाज है डॉक्टर अमर के पास। वैसे सुमेली का शुरूआती इलाज डॉक्टर मुजतसर ने किया था मगर इस वक़्त कब कौन डॉक्टर, मुसलमान हो जाए इसका भरोसा नहीं किया जा सकता तो मैं अस्पताल में छिपते-छिपाते डॉक्टर अमर को ढूंढने लगा।

पूरे अस्पताल के चक्कर काटकर जब मैं थक सा गया और मेरे उम्मीदों का चाँद बादलों में छुप सा रहा था तब मैं सुमेली की तबीयत जानने उसके कमरे की तरफ बढ़ा। सुमेली के कमरे की तरफ बढ़ा ही था कि कुछ क़दमों के रेंगने की आवाज़ आने लगी। मैं थम गया और हाथ में एक लोहे का डंडा उठा लिया। कहीं कोई मुसलमान तो नहीं? कोई गुटबंधी या कोई फौजी? धीरे-धीरे क़दमों को रफ़्तार दी तो देखा कि सुमेली के कमरे के दरवाज़े से लगकर एक आदमी दरवाज़े से अन्दर झाँकने की कोशिश कर रहा है। मेरी रूह कांप गई। उस आदमी की पीठ मेरी तरफ थी तो कुछ समझ नहीं आ रहा था।

धीरे धीरे मैं आगे बढ़ाऔर ठीक उस आदमी के पीछे की दीवार में खुद को छिपा लिया। कहीं यह मेरी सुमेली और हमारे बच्चे को कोई हानि तो नहीं पहुचाने वाला है? कहीं ये हमारे ही खून का भूखा तो नहीं? थोड़ा इधर-उधर हटकर देखा तो पता लगा कि उस आदमी का मुँह दाढ़ी से भरा हुआ है और सिर पर टोपी है यानि यह हिंदू तो बिलकुल ही नहीं है। दिल में दंगों का भाव उमड़ रहा था। अचानक उस आदमी ने जेब से छुरी निकाली और इधर-उधर देखकर दरवाज़े के अन्दर दाखिल होने लगा।

अब मेरा खून खौल चुका था। यह पक्का कोई मुसलमान था जिसे अन्दर सुमेली के होने की भनक लग चुकी थी। मैं भागा और हाथ में लिया लोहे का डंडा उस आदमी के सिर पर दे मारा। उस आदमी की चीख के साथ-साथ सुमेली भी चिल्ला उठी। भागकर जाकर कमरे की बत्ती जलाई तो देखा वो आदमी मुहँ के बल गिरा पढ़ा है और सिर से खून बह रहा है और साथ में सुमेली भी ज़मीन पर पड़ी लम्बी-लम्बी सांसों के साथ आहें भर रही है।

वो आदमी जिसके सिर पर मैंने वार किया उसके पलटने पर उसका चेहरा देखा तो पाया वो डॉक्टर अमर ही है जिन्होंने दहशत के कारण अपना भेस बदल लिया था और मेरे सिर पर वार से वो सुमेली के पहियों वाले बिस्तर पर जा गिरे और सुमेली बिस्तर से नीचे गिर गई।

इससे पहले कि मैं कुछ समझता और मदद की गुहार करता दोनों ने ही एक लम्बी, आखिरी और दहशतबंध सांस भरी और एक ही शब्द कहकर अपनी ज़िंदगियों को पूर्णविराम और आत्मा को आज़ाद किया।

“हे राम!!”

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