झुलसता गोश्त | कल्लोल मुखर्जी

घर के अन्दर एक शमशान सी शांति है और घर के बाहर मौत के पहले का कोहराम मचा हुआ है। जिन दीवारों से टकराती ध्वनि लहरें कभी शांत नहीं होती थीं आज शांत है, किसी ज़मीन से ढाई इंच ऊपर पहुँचे शराबी की तरह। सब शांत है, अनजान है, अजीब है और अराजक है।

दियासलाई की जलती लौ आज दीयों को छोड़ मशालों का मुँह जला रही है। अँधेरे में मशालों का विद्रोह भभक रहा है। अनजान मुखौटों के पीछे छुपे बेजान चेहरों का एक हुजूम नज़दीक आ रहा है, इतना नज़दीक आ चुका है कि अब दीवारों के इस पार से उस पार की गर्मी महसूस होने लगी है।

इन सब के बावजूद भी वो शांत है। वो मरा नहीं है और ना ही थका है। वो बूढ़ा भी नहीं हुआ है, मगर अब वो मौत को गले लगाना चाहता है। उसके घर में अभी उसके सिवा कोई नहीं है। हाँ, कुछ वक़्त पहले उसका लड़का, उसकी बहु, पोते सब इसी घर में थे मगर अब सब घर-गाँव छोड़ भाग चुके है।

वो आँखे बंद करता है और अपने पिता के साथ अपने बचपन में आँखे खोलता है। चारों तरफ आज़ादी के नारे लग रहे हैं। एक बड़ा, घना और आक्रोशी भारतीयों का समूह अपनी आवाज़ बुलंद कर रहा है। यह भीड़ भारतीयों की है। भारतीय हिंदुओं या भारतीय मुसलमानों की नहीं। सिर्फ और सिर्फ भारतीयों की। उसके पिता उसका हाथ ज़ोरों से पकड़े हुए हैं और आज़ादी के नारे लगा रहे हैं। आवाज़ बुलंद, और ज़्यादा बुलंद होती चली जा रही है कि तभी बंदूकों के चलने की आवाज़ से सब शांत हो जाता है। उसके पिता की जकड़ एकदम से कमज़ोर हो जाती है। उसके चारों तरफ खून है। भारतीयों का खून। किसी मुसलमान या हिन्दू का नहीं, सिर्फ भारतीयों का खून।

“पता नहीं कौन सा पागलपन सवार है आपके दिमाग में? भाग चलिए यहाँ से वर्ना ये सांप्रदायिक दंगे सब ख़त्म कर देंगे।”

ये उसके बेटे के आखरी स्वर थे अपनी पत्नी और बच्चों को लेकर भागने से पहले। वो अपने बाप को पागल कह रहा था, मगर क्या वो सच में पागल है? क्या उसके बाप के बाप की कुर्बानी सिर्फ एक पागलपन थी? आखिर कब तक कोई अपने धर्म को छिपाते, इधर-उधर पलायन करता फिर सकता है? कब तक?

वो ज़िद्दी है अपने बाप की तरह, पागल नहीं। वो क्यों भागे? क्योंकि वो सिर्फ एक ख़ास मज़हब से ताल्लुक रखता है, क्या इसलिए? उसकी भाषा दूसरों से अलग है, क्या इसलिए? उसका रहन-सहन दूसरों से अलग है, क्या इसलिए? जिस मिट्टी की ज़िद ने उसके बाप का खून बहाया है उस मिट्टी को वो कैसे छोड़ सकता है? ये मिट्टी किसी मज़हब की नहीं, ये तो लाखों के मांस से बहे खून से सिंची मिट्टी है, जिसका कोई मज़हब नहीं।

वो नहीं भागेगा। वो अपने खून को आग में जलता-सूखता देख लेगा मगर इस मिट्टी से हिलेगा तक नहीं।

उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं है। वो हिंसा की मशालों को अपनी तरफ़ आते महसूस कर रहा है। वो एक लम्बे आईने के सामने खड़ा खुद को निहार रहा है। उसके चेहरे के भाव बदल चुके हैं और अब वो अपने कपड़े फाड़ने लगा है। वो निर्वस्त्र है। वो नहीं चाहता कि उसके वस्त्रों से कोई उसके धर्म का आंकलन करे। वो मौत के इतने करीब आकर सिर्फ एक इंसान की मौत मरना चाहता है। मानवता की मौत का प्रतीक बनना चाहता है।

झूलती कुर्सी पर अपने नंगे बदन को झुलाता, माथे को आकाश की तरफ कर, अपनी आँखों को दोबारा ना खोल पाने का इंतज़ार कर रहा है। तभी एक झटके के साथ वो कुर्सी से उठता है और भाग कर अलमारी से सारी किताबों को नीचे गिरा देता है।

उन किताबों से वो पहले अपनी कब्र बनाता है, और फिर उनके पन्नों को फाड़ वो अपनी कब्र की चादर बनाता है। पन्नों के टुकड़े-टुकड़े कर अपने नंगे बदन के ऊपर उन चीथड़ों को फैलाता है और आखिरी दफ़ा आँखें बंद कर लेता है।

अब मशालों की आग उसकी दीवारों को पार कर उसकी कब्र तक पहुँच चुकी है। उसकी उम्र भर की पूंजी, उसकी किताबें आग की लपटों में आने लगी हैं। उसकी कब्र के अन्दर की गर्मी बेहद बढ़ चुकी है। वो सह रहा है मगर उसके चहरे पर ऐसे कोई भाव नहीं है। वो खुश है, वो धर्मों का चोला ओढ़े इस दुनिया को अलविदा कह रहा है।

धार्मिक किताबों के टुकड़ों की आग छालों की तरह उसके शरीर में चुभ रही है मगर वो फिर भी नहीं हिल रहा है। यही शायद उसकी कुर्बानी है जिसे पागलपन कह दिया गया है। उसका गोश्त सूखने लगा है और खून आग में झुलसकर भाप बन गया है।

कुछ ही देर में सब भस्म हो गया। सब जल कर राख हो गया। कुछ धर्म के नंगों की मौत हो गई और बहुत से निष्पक्ष और निरपेक्ष जानें कुर्बान हो गईं।

“मुट्ठी भर लोगों के हाथों में लाखों की तक़दीरें हैं,
जुदा जुदा हैं धर्म इलाक़े एक सी लेकिन ज़ंजीरें हैं।

आज और कल की बात नहीं है सदियों की तारीख़ यही है,
हर आँगन में ख़्वाब हैं लेकिन चंद घरों में ताबीरें हैं।”

नज़्म- निदा फ़ाज़ली | कहानी- कल्लोल मुखर्जी

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