आज़ाद पिंजरा । कल्लोल मुख़र्जी

कभी-कभी जब ज़िन्दगी दिल से सवाल पूछ लेती है, तब समझ आता है कि हम क्यों हैं, किसलिए हैं और किसके लिए हैं।

खैर, हमेशा की तरह नौ घंटे एक कुर्सी से चिपककर, खट-खट कीबोर्ड की आवाज़ और एसी की सो कॉल्ड शुद्ध, आर्टिफीशियल हवा खाकर, अपने दिन का सबसे बेहतरीन आधा घंटा बिताने मैं मरीन ड्राइव पर सुमोना के साथ बैठा था। हर रोज़ हम यहीं बैठते हैं, कुछ वक़्त साथ बिताकर, प्यार में होने का एहसास ताज़ा कर, अपने-अपने घोंसलों में वापस चले जाना हमारी दिनचर्या का हिस्सा है।

आज मरीन ड्राइव पर हवा बहुत तेज़ रफ़्तार से चल रही थी और मेरे पैरों को छूती इन लहरों को शायद कुछ और ही चाहिए था। तभी तो आज दिमाग ने अपना सारा दारोमदार इस बेफ़िक्र दिल को दे दिया था।

”सुमोना, इन कबूतरों को देख रही हो? क्या सही ज़िन्दगी है ना इनकी?”

”क्या ज़िन्दगी है?”

”मतलब, देखो ना, आज यह यहाँ हैं, कल मेरे घर की छत पर थे। जहाँ चाहें वहां जाते हैं, बेख़ौफ़, बेबाक।”

”हाहा विशाल, ये कबूतर और तुम्हारी छत वाले कबूतर अलग-अलग हैं।”

”हाँ, मगर आज़ाद तो हैं, जाने को तो जा सकते हैं। है ना?”

”हाँ तो उनकी ज़िन्दगी में और है भी क्या?”

”हम्म, सही बात है सुमोना। मगर कभी तुमने सोचा है, हमारी ज़िन्दगी में क्या है? हम क्यों जीते हैं इसे?”

”नहीं, और अब ये कैसी बातें करने लगे तुम? चिल करो ना।”

”हम्म, पता है सुमोना, हमें लगता है कि हमने ज़िन्दगी पर काबू पा लिया है, मगर नहीं, ये ज़िन्दगी तो हमें किसी मदारी की तरह पैसे, इज्ज़त, शोहरत के पीछे नचा रही है।”

”देखो, तुम जो भी बोल रहे हो मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। आई थिंक यू नीड सम टाइम अलोन!”

”हुह..अलोन। यह बताओ तुम्हारे लिए आज़ादी के क्या मायने हैं?”
”आज़ादी यानी कुछ भी करो, कहीं भी जाओ, कोई रोकने वाला नहीं, यह आज़ादी है।”

”तो क्या तुम आज़ाद हो?”

”हाँ, ऑफ़कोर्स आई ऍम इंडिपेंडेंट। देखो ना, घर से दूर काम कर रही हूँ, अपने तौर से ज़िन्दगी जी रही हूँ। यही तो है आज़ादी।”

”तो क्या तुम उड़ सकती हो?”

”क्या मतलब?”

”मतलब, देखो ना, कहने को तो मैं भी आज़ाद हूँ, मगर उस 6×10 के कमरे के अन्दर ही। सुबह उठना, फ्रेश होना, दफ्तर जाना, फिर घर आकर खाना खाना और सो जाना। शायद यही आज़ादी है मेरी, और शायद तुम्हारी भी। है ना?”

”कहना क्या चाहते हो तुम?”

”मतलब, हम सफ़र तो कर रहे हैं, मगर कहीं पहुँच नहीं रहे। तुम्हें लगता है कि तुम आज़ाद हो मगर नहीं, तुम गुलामी में कैद हो। उस छोटी सी 6×10 की दुनिया में सिमटी हुई हो। तुम लाखों में एक नहीं लाखों सी एक हो। तुम गुलाम हो हर उस चीज़ की जिसकी तुम्हें फ़िक्र है। तुम गुलाम हो समाज की, तुम गुलाम हो इज्ज़त की, तुम गुलाम हो रुतबे की। तुम्हारा शरीर तो आज़ाद है मगर तुम्हारा दिल और दिमाग अब भी गुलाम है।”

”पागल हो गए हो क्या?”

”हाहा पागल! सुमोना ऐसा क्यों होता है कि जब हम अपने दिल की बात करें, कुछ अलग करने की बात करें तो लोग पागल कह देते हैं? काश तुम भी आज़ादी और गुलामी में फर्क कर पातीं।”

”तो तुम क्या चाहते हो?”

”मैं जीना चाहता हूँ। उस 6×10 के कैबिन में मेरा दम घुटता है। मैं इन कबूतरों के जैसे उड़ना चाहता हूँ, अनजान लोगो के बीच हँसना चाहता हूँ, दुनिया को समझना चाहता हूँ, रोज़ नई कठिनाइयों का सामना करना चाहता हूँ, मैं हारना भी चाहता हूँ, मैं गिरना भी चाहता हूँ। सुमोना, मैं खुद को खोजना चाहता हूँ और खुद को जीना चाहता हूँ।”

”सुनो विशाल, तुम अभी घर जाओ हम कल मिलेंगे। ठीक है?”

”पता है सुमोना, हमें किसने कैद कर रखा है? इन नोटों ने। ज़िन्दगी की शुरुआत से ज़िन्दगी के अंत तक, हम इन्हें ही कमाने में लगे रहते हैं। जिसके पास नोट ज़्यादा, वो बड़ा और जिसके पास कम, वो छोटा। काश हम कभी मुद्रा ही ना बनाते। सुमोना, जिस दिन हम पैसों की चिंता करना छोड़ देंगे ना उस दिन हम जीना सीख लेंगे, आज़ादी चख लेंगे, आज़ाद हो जाएंगे इन कबूतरों की तरह।”
”तो क्या तुम बिना रुपए पैसों के ज़िन्दगी जियोगे? क्या खाओगे, कहाँ रहोगे? हर चीज़ करने के लिए पैसे लगते हैं विशाल, भूलो मत।”

मैं शांत रहा, उसके सवाल का जवाब शायद नहीं था मेरे पास या शायद देने में दिलचस्पी नहीं थी।

”सुमोना, वैसे हम साथ क्यों हैं?”

”यह कैसा सवाल है अब? हम एक दूसरे से प्यार करते हैं इसलिए साथ हैं।”
”अच्छा! तो कल अगर मैं नौकरी छोड़ दूँ और तुम्हारी कमाई में गुज़ारा करूँ तो क्या तुम्हारे घर वाले मुझे अपना लेंगे?”

इस बार सुमोना ने कोई जवाबी प्रतिक्रिया नहीं दी।

”क्या हुआ सुमोना, बोलो ना। नहीं अपनाएंगे ना तुम्हारे घर वाले मुझे और ना ही तुम। तुम्हें प्यार मुझसे नहीं बल्कि मेरे हालातों से है। तुम चाहती हो कि तुम्हारी प्रेम कहानी भी हो और वो कहानी जैसी तुम चाहो वैसी ही हो। वैसे गलती तुम्हारी नहीं है, समाज तो यही सिखाता है ना हमें। हमें हर चीज़ अपने मुताबित चाहिए, अपने अनुकूल।”

”तुमने इतनी बड़ी बात कह दी और ज़रा सोचा भी नहीं? सुनो, मैं जा रही हूँ जो करना है करो, जहाँ मरना है मरो।”

”बाय बाय सुमोना, हैव अ हैप्पी लाइफ, द वे यू वॉन्ट टू लिव इट, ओह सॉरी, वॉन्ट टू मोल्ड इट।”

यह ज़ुबान दिल की थी या दिमाग की, शायद पता नहीं। यह भी नहीं पता की मेरी ज़ुबान में आज़ादी के रंग इन हवाओं ने घोले थे या इन समुंदर की लहरों ने और शायद उस दिन मैं सुमोना को कुछ ज़्यादा ही बोल गया।
जो भी हो, उस दिन के बाद से जब भी वक़्त मिलता है, मैं शाम के 5:30 से 6:00 बजे मरीन ड्राइव में ठीक उसी जगह बैठता हूँ और हवाओं और समुन्द्र की लहरों के साथ जुगलबंदी करता हूँ। बस फर्क सिर्फ इतना सा है कि अब सुमोना साथ नहीं बैठती।

अब उस 6×10 के कैबिन में दम नहीं घोटना पढ़ता। अब मैं देश-विदेश में अनजान चेहरों की अभिव्यक्ति, भावना, चेतना, उत्तेजनाओं को अपने कैमरे में कैद करता हूँ। आज़ाद हूँ, ठीक उन कबूतरों की तरह, बेख़ौफ़, बेबाक।

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