अब मुझे अँधेरे से डर नहीं लगता । कल्लोल मुख़र्जी

**अब मुझे अँधेरे से डर नहीं लगता**

“हेल्लो विभु, कैसी हो तुम?”

“ठीक हूँ शालिनी, और तुम?”

“मैं भी ठीक। अँधेरा होने लगा है, तुम चाहो तो मैं आ जाऊँ तुम्हारे घर?”

“तुम क्या करोगी शालिनी? सब ठीक तो है यहाँ।”

“हॉस्टल के दिन याद हैं? कैसे मेरे घर जाने पर तुम अकेले लाइट जलाकर सोती थीं?”

“हाँ पर अब चीज़ें बदल गई हैं।”

“पक्का ना? तुम्हें डर नहीं लगेगा रात को?”

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“मुझे डर लगता है शिवांश। कसम खाओ तुम मुझे इस तरह अकेला छोड़कर अब नहीं जाओगे।”

बरामदे में सूरज की रोशनी कम होने लगी थी। शाम ढल रही थी और टेबल पर दो चाय के कप दो होंठों का इंतज़ार कर रहे थे। मेरा गला सूखने लगा था कि तभी दरवाज़े की घंटी बजी। दरवाज़े के उस पार शिवांश थे। मैंने चैन की सांस भरी और फिर हम साथ बैठकर चाय पीने लगे।

“मुझे कल कुछ काम से पुणे जाना है,” शिवांश ने कहा।

“अच्छा, और लौटोगे कब?”

“परसों सुबह।”

“क्या? मतलब कल रात मुझे अकेला सोना पड़ेगा?” मैं घबरा गई।

“हाँ!”

“नहीं! मुझे भी ले चलो ना तुम्हारे साथ।”

“अरे अभी-अभी तुमने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया है, ऐसे बीच में इम्तेहान के वक़्त छुट्टी करोगी तो कैसा impression पड़ेगा?”

अँधेरा फैल चुका था। सड़कों पर सफ़ेद पीली बत्तियां जलने लगीं थीं। आसमान काला हो चुका था। टेबल पर एक प्याले में चाय ख़त्म हो चुकी थी और दूसरे की ठंडी हो चुकी थी, ठीक मेरे शरीर की तरह।

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“बीती रात मुझे नींद नहीं आई, पता नहीं आज कैसे रात कटेगी।” मैंने शिवांश का टिफ़िन बाँधते हुए कहा।

“घबराओ मत,” और इतना कहकर शिवांश चले गए।

शिवांश के जाने के बाद मैं घड़ी को ताक लगाए देखने लगी। शाम ढलने लगी थी, ठण्ड बढ़ने लगी थी, और अँधेरा मुझे जकड़ने लगा था। दीवार में टंग रही हमारी शादी की तस्वीर को ओझल होते देख मैंने कमरे की बत्ती जला दी। टीवी चलाया और मन को बहलाने की कोशिश करने लगी। आज दोनों चाय के प्याले दोनों होंठों का इंतज़ार ही करते रह गए।

सोने का वक़्त करीब आता जा रहा था और मैं अपने डर के अधीन होते जा रही थी। कोशिश की… काफी कोशिश की मगर नहीं। अब तो मैं शिवांश के इतने अधीन हो चुकी हूँ कि कमरे की बत्ती जलाकर भी नींद नहीं आ रही।

“शालिनी? क्या तुम आज मेरे घर सोने आ सकती हो?”

“क्यों क्या हुआ विभु? सब ठीक है?”

“हाँ। तुम आ सकती हो या नहीं ये बताओ।”

“मुझे मेरे पति से पूछना पड़ेगा।”

“सुनो ना। शिवांश घर पर नहीं हैं, तुम प्लीज़ अपने पति को मनाकर आ जाओ।”

“अच्छा। कोशिश करती हूँ।”

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सड़कों पर सूरज की रोशनी आ चुकी थी और डर के बादल अब छंट चुके थे। कल रात मेरे साथ ठहरी शालिनी अपने घर को जा चुकी थी। दरवाज़े की घंटी बजी, शिवांश थे, मैं उनसे लिपट गई।

“मुझे डर लगता है शिवांश। कसम खाओ तुम मुझे इस तरह अकेला छोड़कर अब कभी नहीं जाओगे।”

“हाँ। इसलिए मैंने अब फैसला किया है कि हम अलग अलग कमरों में सोयेंगे।” शिवांश ने एलान किया।

“क्या?” मेरे स्वर बुझ गए।

“हाँ, जबतक तुम्हारा अँधेरे का डर ख़त्म नहीं हो जाता।”

“नहीं! ऐसा मत करो शिवांश। मैं मर जाऊँगी ऐसे।”

मैं चिल्लाती रही मगर शिवांश टस से मस नहीं हुए और दो प्यालों से अब दो अलग अलग बिस्तर हो गए। मैं रात भर नहीं सोती और दिन में शिवांश मेरे हिस्से का काम करते। पता नहीं किस बात की अकड़ थी उन्हें कि मेरे इस डर को दूर भगाने की ठान ही ली थी।

कुछ दिन रात भर नहीं सोई, फिर अगले कुछ दिन सोई मगर कमरे की बत्ती जलाकर। अब रात में जलती बत्ती को शिवांश बंद करने लगे थे और मैं डरपोक इतना हिम्मत नहीं कर पाती थी कि रज़ाई से निकलकर बत्ती जला लूँ। वक़्त का पहिया घूमता रहा और मेरा अँधेरे का डर कहीं भागता रहा। अब मैं रात से नहीं डरती। सूरज के जाने के बाद अँधेरे में बैठ लेती हूँ और रात को कमरे की बत्ती बंद कर सोना भी सीख लिया है।

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“विभु, मुझे ऑफिस के काम से कुछ दिन के लिए पुणे जाना पड़ेगा।”

“क्यों?”

“कोई अर्जेंट काम आ गया है। सुना है प्रमोशन भी हो सकता है। तुम मेरा बैग पैक कर दो। शाम को निकलना है।”

“ठीक है।”

मैं शिवांश का बैग पैक करने लगी। कुछ कपड़े जमाये, दो जोड़ी जूते-चप्पल, और ज़रुरत का सामान सब डालने लगी मगर देखा कि शिवांश मुझे एक टक देख रहे हैं।

“क्यों जी? ऐसे क्यों देख रहे हो?”

“नहीं, कुछ नहीं,” शिवांश ने आँखे चुराते हुए कहा।

“अच्छा सुनो, वो दीवार पर टंग रही हमारी शादी की फोटो ले जाऊँ क्या साथ?”

“क्यों? अभी से तुम मुझे मिस करने लगे?”

“नहीं, मतलब हाँ!” शिवांश ने हिचकिचाते हुए सच बोल दिया।

“ठीक है ले जाओ, और तुम्हारे मनपसंद लड़्डू का डब्बा भी ले जाना।”

“ओके! चलो अब मैं निकलूँ?”

“हाँ!”

“डर तो नहीं लगेगा?”

“नहीं!”

“पक्का?”

“हाँ! पक्का! अब मुझे डर नहीं लगता।”

शिवांश कुछ देर तक मेरी आँखों में आँखें डाल कर देखे, ठीक उसी तरह मुस्कुराए जैसे पहली मुलाकात में मुस्कराए थे और फिर कंधे पर बैग लेकर चल दिए।

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शिवांश घर से और मुझसे दूर पहली बार इतने दिन के लिए गए थे इसलिए उनकी याद बड़ी आती थी। और हर बार याद आते ही मैं उन्हें फ़ोन कर लिया करती थी। कभी काम में होते थे तो कभी फ़ोन नहीं उठाते थे। मगर रोज़ रात को सोने से पहले फ़ोन कर मुझे अकेले रहने और अँधेरे का सामना करने की सीख देते और दो-चार कुछ बातें कर सोने चले जाते। शायद नौकरी के प्रेशर में वक़्त नहीं निकाल पाते या फिर थक जाते। फिर एक दिन उन्होंने दोपहर को अचानक से फ़ोन किया।

“विभु, तुम्हे पता मैं खुद को बहुत लकी समझता हूँ कि मुझे तुम्हारी जैसी बीवी मिली।”

“शुक्रिया। मगर आज क्या बात है शिवांश, अच्छे मूड में लग रहे हो?”

“नहीं विभु। तुम्हे पता है मैं चीज़े दिल में रखता हूँ मगर ज़ुबां तक नहीं ला पाता।”

“हाँ पता है, मगर आज दिल की बात ज़ुबां पर कैसे?”

“अरे वो सब छोड़ो ना। तुम्हें पता है मैं तुम्हें यहाँ बहुत मिस करता हूँ और तुम्हारे हाथ की चाय को भी।”

“हा हा। मेरी चाय की प्याली तुम्हारा इंतज़ार कर रही है, कब आ रहे हो?”

“पता नहीं, पर विभु तुम आखिरकार सीख ही गई अकेले रहना। अँधेरे का सामना करना। है ना?”

“सब तुम्हारी बदौलत है शिवांश।”

“नहीं। मुझे क्रेडिट मत दो। तुमने ही किया है सब। तुमने बच्चे पढ़ाना शुरू किया। अकेले सोना अकेले रहना, यह सब तुमने सीखा है।”

“बच्चे पढ़ाने की ज़िद्द तो तुमने ही की थी।”

“किसने क्या किया वो सब छोड़ो, मगर मेहनत तो तुमने की और उसका फल तुम्हारे सामने है।”

“हाँ! थैंक्स। बहुत खुश हूँ आज मैं।”

“अच्छा, अब मैं चलता हूँ। बॉस बुला रहे है।”

फ़ोन कट गया और फिर रात को सोते वक़्त भी फ़ोन नहीं आया। मैं इंतज़ार करती रही मगर मेरे दिल की आवाज़ उनतक नहीं पहुची। मैंने फ़ोन करने का भी सोचा मगर फिर ध्यान आया कि शायद आज थककर सो गए होंगे।

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फ़ोन की घंटी का इंतज़ार सुबह से कर रही हूँ मगर बज नहीं रही। सुबह से दोपहर होने को आई है मगर फ़ोन नहीं बज रहा। गुस्सा आया और मैंने उन्हें फ़ोन लगा दिया।

“हेल्लो।” सामने से एक महिला की आवाज़ आई।

“हेल्लो! आप कौन?” शायद शिवांश अपना फ़ोन कहीं भूल गए हैं।

“जी मेरा नाम सीमा है और मैं मेट्रो हॉस्पिटल से बात कर रही हूँ। आपको कौन चाहिए मैडम?”

हॉस्पिटल? यह शिवांश का मोबाइल वहाँ कैसे पहुँचा?

“जी यह फ़ोन जिनका है मैं उनकी पत्नी विभूति बात कर रही हूँ। क्या मेरी शिवांश से बात हो सकती है?”

“जी शिवांश जी की तो कल शाम को ही मौत हो गई। उन्होंने ही अपना मोबाइल मुझे दिया था कि अगर कोई फ़ोन आये तो मैं यह जानकारी दे दूँ।”

“क्या?”

मेरा माथा ज़ोरों से फटने लगा था। मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि यह लड़की क्या बोले जा रही है।

“मैडम, शिवांश जी को कैंसर था और वो काफी सीरियस हो गया था। शिवांश जी पिछले कुछ दिनों से यहाँ हॉस्पिटल में ही भर्ती थे। बार बार आपका नाम ले रहे थे।”

मुझे अब भी विश्वास नहीं हो रहा था कि शिवांश अब इस दुनिया में नहीं रहे। शिवांश ऑफिस की तरफ से नहीं बल्कि अपना इलाज कराने गए थे? और बच्चों को पढ़ाना और कमरे में अकेले सुलाना और अँधेरे का सामना करना वो सब?

“मैडम हम बॉडी आपके पते पर भेज रहे हैं, और जो भी उनका सामान…”

मेरे हाथ से फ़ोन गिर गया और मैं ज़मीन पर बैठ गई। मेरी आँखें भर आईं थीं और शरीर अकड़ सा गया था। दिमाग शिवांश नहीं है इस बात को मान ही नहीं पा रहा था और दिल में रखी शिवांश की तस्वीर एक विशाल रूप ले चुकी थी। सब ख़त्म हो चुका था।

सब कुछ।

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“हेल्लो… विभूति.. सुन रही हो? पक्का ना, तुम्हें डर नहीं लगेगा रात को?”

“नहीं। अब कभी डर नहीं लगेगा मुझे शालिनी, कभी नहीं।”

“ठीक है। मैं कल सुबह आती हूँ।”

“ठीक है।”

शायद शिवांश मुझे अपने पैरों पर खड़ा करना चाहते थे। शायद चाहते थे कि मैं उनके बिना रहना सीखूं। उन्होंने अपनी बीमारी के बारे में कभी नहीं बताया मगर अपने बिना रहना सिखा दिया। बच्चों को पढ़ाना, एक प्याली चाय बनाना, घर में अकेले रहना, अकेले बिस्तर पर सोना और सबसे ज्यादा अँधेरे का डर भगाना, शिवांश तुमने अपना देह तो छोड़ दिया मगर मेरे दिल में अब भी तुम्हारी धड़कनें चल रही हैं, और शायद हमेशा चलती रहेंगी।

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